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बिहार विधानसभा चुनाव—पहला चरण पूरा: 18 जिलों की 121 सीटों पर 60%+ वोटिंग; छिटपुट हिंसा, तकनीकी रुकावटें और मतदाता-दमन के बीच लोकतंत्र की परीक्षा

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पटना 6 नवंबर 2025

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के पहले चरण का मतदान गुरुवार, 6 नवंबर को सुबह 7 बजे से शाम 6 बजे तक चला और कतार में खड़े मतदाताओं को नियमानुसार देर तक वोट डालने दिया गया। शाम 5 बजे तक राज्य-भर में औसतन 60% से अधिक मतदान दर्ज होने की शुरुआती तस्वीर ने चुनावी उत्साह और जनता की भागीदारी का संकेत तो दिया, लेकिन इस उत्साह के साथ-साथ ज़मीन पर मतदाता-दमन और मतदान में व्यवधान के गंभीर आरोप भी उभरकर आए। कई जिलों से मिली शिकायतों—औपचारिक और अनौपचारिक दोनों—का स्वर यही रहा कि अगर जगह-जगह हजारों मतदाताओं को वोट से नहीं रोका जाता, तो टर्नआउट और भी ऊपर जा सकता था। यह विरोधाभास—ऊँचा मतदान प्रतिशत और समानांतर में दमन/अव्यवस्था के आरोप—पहले चरण को लोकतांत्रिक दृष्टि से एक कठिन परीक्षा बना देता है।

दिन भर सामने आती घटनाओं में एक सातत्य यह दिखा कि प्रशासनिक चूकों और स्थानीय दबाव समूहों दोनों ने विभिन्न स्थानों पर मतदाताओं का मार्ग रोका। कई बूथों पर मतदाताओं को यह कहकर लौटाने की शिकायतें मिलीं कि “आपका वोट पहले ही डाला जा चुका है।” ऐसे मामलों में मतदाताओं ने ईवीएम/वोटर-लिस्ट की जाँच तथा टेंडर्ड वोट (आपत्ति स्वरूप मत) की मांग की, लेकिन सभी जगह त्वरित समाधान नहीं मिला—कहीं-कहीं बूथ-लेवल अधिकारी और सुरक्षा-बल स्थिति समझाने और भीड़ नियंत्रित करने में उलझे रहे। कुछ निर्वाचन क्षेत्रों में, ख़ासकर दूरदराज़ और नदी-पार इलाक़ों में परिवहन बाधाओं ने भी लोगों का रास्ता रोका—नाव/स्टीमर सेवा सीमित होने की शिकायतें दोहराई गईं—जिससे हजारों मतदाताओं को सही समय पर अपने बूथ तक पहुँचना मुश्किल पड़ा। चुनावी भूगोल की दृष्टि से यह बाधाएँ सीधे-सीधे अंतिम टर्नआउट को प्रभावित करती हैं, क्योंकि ग्रामीण/हाशिए पर बसे समुदायों का वोट बड़े पैमाने पर लॉजिस्टिक सहूलियतों पर निर्भर करता है।

कई जिलों से यह भी आरोप आए कि स्थानीय दबंगों ने दलितों, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों पर दबाव बनाया और कई जगह खुले-आम रास्ते रोके, जिससे वे मतदान केंद्रों तक नहीं पहुँच पाए। ऐसे बिंदुओं पर पुलिस-प्रशासन की त्वरित तैनाती और फ़्लैग मार्च की सूचना भी आई, पर पीड़ितों का कहना है कि “पहला डर” और “पहला अवरोध” पार करने के बाद ही मदद पहुँची, तब तक वोटिंग की खिड़की का क़ीमती समय बीत चुका था। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदान का ‘डर-मुक्त अधिकार’ सिर्फ़ कागज़ी नहीं होना चाहिए—यह बात इन घटनाओं ने फिर याद दिलाई। चुनाव आयोग ने संवेदनशील बूथों पर वेबकास्टिंग, माइक्रो-ऑब्ज़र्वर और क्विक-रिस्पॉन्स टीमों की मौजूदगी का दावा किया, मगर ज़मीनी अनुभवों में “प्रिवेंटिव डिटरेंस” और “रियल-टाइम रिलीफ़” के बीच अंतर दिखाई दिया—यानी रोकथाम की नीयत तो थी, पर हर जगह राहत उतनी तेज़ नहीं मिली जितनी ज़रूरत थी।

तकनीकी मोर्चे पर, अनेक बूथों से EVM/VVPAT के रुक-रुक कर ठप पड़ने या धीमी गति से रिप्लेसमेंट होने की शिकायतें दिनभर आती रहीं। यह समस्या जितनी तकनीकी है, उतनी ही मनोवैज्ञानिक भी—क्योंकि मशीन बदलने में देरी, लंबी कतारें और बूथ की अव्यवस्था से वोटर का भरोसा हिलता है और वे बीच में ही लौट जाते हैं। कई स्थानों पर मोबाइल रखने के बैग/थैले न होने से मतदाताओं को बूथ से वापस जाने को कहा गया—आचार-संहिता के लिहाज़ से यह सही हो, पर व्यावहारिक रूप से इससे भीड़ और झुंझलाहट बढ़ी और कुछ लोग फिर लौटकर नहीं आए। कुल मिलाकर—टेक्निकल ग्लिच, लॉजिस्टिक कमी और भीड़-प्रबंधन की खामियों ने “इच्छुक मतदाता” को “वास्तविक मतदान” तक पहुँचने में बाधाएँ खड़ी कीं; यही कारण है कि स्थानीय संगठनों और विपक्षी दलों की राय में “टर्नआउट और ऊँचा हो सकता था।”

छिटपुट हिंसा और तनाव के प्रसंग भी इस नैरेटिव को और जटिल बनाते हैं। लखीसराय में एक शीर्ष राजनैतिक चेहरे के काफ़िले पर पथराव, बक्सर में प्रतिद्वंद्वी खेमों के समर्थकों के बीच मारपीट, दरभंगा के जाले में पोलिंग एजेंटों की झड़प और पत्थर फेंके जाने की घटना, मुजफ़्फ़रपुर के साहेबगंज में कहासुनी और धक्का-मुक्की—इन सभी ने इस बहस को हवा दी कि “क्या डर-रहित मतदान का माहौल हर जगह सुनिश्चित हुआ?” पुलिस-प्रशासन ने अधिकतर जगह हालात संभाल लिए, गिरफ़्तारियाँ भी हुईं, मगर लोकतंत्र की दृष्टि से एक प्रतिशत भी ‘डर-आधारित चूक’ अस्वीकार्य मानी जाती है, क्योंकि मताधिकार का अर्थ ही है—स्वतंत्र, निर्भीक और समता-आधारित भागीदारी।

इसके बावजूद, पहले चरण की बड़ी तस्वीर यह कहती है कि आम मतदाता—ख़ासकर ग्रामीण महिलाएँ और युवा—ने दोपहर के बाद भीड़ की दीवार और भय के साये के बावजूद अधिक संख्या में बूथों तक पहुँच बनाई। यह जागरूकता उम्मीद जगाती है, पर संस्थागत स्तर पर सीख भी छोड़ती है: (1) संवेदनशील इलाक़ों में शून्य-टॉलरेंस प्रोटोकॉल के साथ अतिरिक्त बल और त्वरित-न्याय तंत्र, (2) नदी/द्वीपीय/दूरस्थ क्षेत्रों में परिवहन-आश्वासन; मतदान दिवस पर नाव/बस/ट्रैक्टर-ट्रॉली जैसी वैकल्पिक व्यवस्थाओं की पहले से पुख़्ता योजना, (3) EVM/VVPAT बदलने की SLA-आधारित (समयसीमा-निश्चित) व्यवस्था और हेल्पडेस्क, (4) टेंडर्ड वोट की प्रक्रिया का बूथ स्तर पर सरल, दृश्य और समयबद्ध क्रियान्वयन, और (5) मतदाताओं के लिए लाइन-मैनेजमेंट व मोबाइल-डिपॉज़िट जैसी छोटी मगर असरदार सुविधाओं की सार्वभौमिक उपलब्धता।

राजनीतिक तौर पर, पहले चरण ने यह स्पष्ट किया कि टर्नआउट की ऊँचाई और दमन/बाधा के आरोप—दोनों समानांतर वास्तविकताएँ हैं। सत्तापक्ष इसे “स्थिर क़ानून-व्यवस्था और विकास पर विश्वास” की मुहर बताएगा, तो विपक्ष “डर, दबाव और व्यवस्थागत खामियों के बावजूद जनता की आवाज़” के रूप में पेश करेगा—मतलब यह कि व्याख्या का युद्ध भी साथ-साथ चलेगा। पर लोकतंत्र की कसौटी अलग है: वह पूछता है—जिसने वोट देना चाहा, क्या वह बिना डर, बिना रोके, बिना बाधा के वोट दे पाया? पहले चरण की घटनाक्रम-सूची बताती है कि इस सवाल का जवाब अब भी सार्वभौमिक ‘हाँ’ में नहीं बदला है। यही वह ‘गैप’ है, जिसे भरना सिर्फ़ अगले चरणों के लिए नहीं, बल्कि चुनावी ढाँचे की विश्वसनीयता के लिए भी अनिवार्य है।

अगले चरणों से पहले प्रशासन के लिए संदेश साफ़ है: निवारण से आगे बढ़कर निवारण+उपचार (Prevention + Rapid Cure) की संयुक्त रणनीति अपनानी होगी—जहाँ दमन के संकेत मिलते ही रीयल-टाइम दख़ल हो, टेंडर्ड वोट/ मशीन- रिप्लेसमेंट/ परिवहन -समाधान मिनटों में मिले, और हर बूथ पर यह भरोसा कायम रहे कि “मेरा वोट—मेरे हाथ” सिर्फ़ नारा नहीं, ज़मीनी सच्चाई है। तभी अंतिम टर्नआउट वह तस्वीर देगा, जो जनता की वास्तविक इच्छा-शक्ति का सबसे सटीक आईना है—और तब हम यह कह पाने की स्थिति में होंगे कि “अगर रोका न जाता, तो प्रतिशत वाक़ई और ऊँचा होता”—अब रोका भी नहीं गया और बढ़ा भी।

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