भारत वह देश है जहाँ हर साल सड़क हादसों में 1.68 लाख लोगों की जान चली जाती है — यानी हर 3 मिनट में एक मौत। यह आंकड़ा पूरी दुनिया में सबसे अधिक है। सरकारें लगातार सड़क सुधार, हाईवे निर्माण और ट्रैफिक नियमों पर अरबों रुपये खर्च कर रही हैं ताकि इस भयावह स्थिति को काबू में लाया जा सके। लेकिन ऐसे समय में सत्ता पक्ष के सांसद कोंडा विश्वेश्वर रेड्डी ने एक ऐसा बयान दिया जिसने सड़क सुरक्षा पर राष्ट्रीय रणनीति की खुली खिल्ली उड़ा दी है। उन्होंने कहा—“अगर सड़कें खराब होंगी, तो दुर्घटनाएं कम होंगी। सड़कें अच्छी बन गईं तो दुर्घटनाएं बढ़ेंगी।”
यह बयान सिर्फ तर्कहीन नहीं, बल्कि उन लाखों परिवारों के दर्द का अपमान है जिन्होंने अपने प्रियजनों को सड़क दुर्घटनाओं में खोया है। यह सोच बताती है कि हमारे नेताओं को या तो आंकड़ों का पता नहीं या फिर जनता की जान किसी प्राथमिकता में नहीं।
विशेषज्ञों के मुताबिक भारत में दुर्घटनाओं की सबसे बड़ी वजहें हैं—खराब सड़क डिजाइन, गड्ढे, ओवरस्पीडिंग और अपर्याप्त ट्रैफिक प्रबंधन। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट साफ़ कहती है कि बेहतर सड़कें दुर्घटनाओं को 50% तक घटा सकती हैं और जिन देशों ने रोड इंजीनियरिंग में निवेश किया वहां मौतें लगातार कम हुईं। इसके विपरीत भारत में सड़क निर्माण के साथ स्मार्ट इंजीनियरिंग, साइनेज, बैरियर और पैदल सुरक्षा पर उतना ध्यान नहीं दिया जाता — इसी वजह से हादसे होते हैं, न कि इस कारण कि सड़कें ‘अच्छी’ होती हैं। यानि सांसद का बयान डेटा, विज्ञान, तर्क—सबके उलट है।
भारत में पिछली रिपोर्ट के अनुसार 60,000 से अधिक मौतें सिर्फ गड्ढों वाली सड़कों के कारण होती हैं। अगर सांसद के बयान को सच मान लिया जाए, तो क्या इसका मतलब यह है कि सरकार को विकास रोक देना चाहिए ताकि दुर्घटनाएं कम हों? क्या गड्ढे, टूटी सड़कें और अराजकता ही अब सुरक्षा मॉडल हैं? यदि ऐसा है, तो यह एक ऐसी सोच है जो जनकल्याण के नाम पर जनता के जीवन के साथ मज़ाक कर रही है। यह बयान सड़क सुरक्षा की गंभीरता को हल्का करके “विकास-विरोधी” तर्क पेश करता है, जिसे कोई भी समझदार नागरिक हज़म नहीं कर सकता।
सोशल मीडिया पर लोग उनका मज़ाक उड़ाते हुए कह रहे हैं
“इसीलिए भारत में सड़कें खराब रखी जाती हैं—ताकि लोग बच जाएँ!” “Only BJP can recruit such Einsteins!”
यह तल्ख टिप्पणियाँ बताती हैं कि जनता अब ऐसे बयानों को गंभीरता से नहीं, उपहास के रूप में देख रही है। जब नेता इस स्तर पर वैज्ञानिक समझ को मसख़रा बना दें, तो सड़क सुरक्षा अभियान किस भरोसे आगे बढ़ेगा?
सच्चाई यह है कि समस्या सड़कें अच्छी होने की नहीं, बल्कि सरकार का ओवरस्पीडिंग रोकने, सुरक्षित डिज़ाइन लागू करने और कानून सख्ती से लागू करने में असफल होना है। हादसे इसलिए बढ़ते हैं क्योंकि व्यवस्था लापरवाह है — न कि इसलिए कि सड़कें मजबूत और चौड़ी हैं। लेकिन जब संसद में बैठे जनप्रतिनिधि ही लोगों की जान से जुड़े मुद्दों पर इस तरह के गैरजिम्मेदार बयान दें, तो सवाल यह उठता है—क्या भारत में बुनियादी ढांचे का भविष्य ‘विज्ञान’ पर चलेगा या ‘विकृत तर्कों’ पर?
यह बयान सिर्फ एक मज़ाक नहीं — यह देश की सुरक्षा नीति पर अज्ञान और असंवेदनशीलता का प्रमाण है। और सबसे बड़ी त्रासदी यह कि ऐसे बयानों पर सत्ता चुप है। जब जीवन की रक्षा पर राजनीति हावी हो जाए, तभी तो सड़कें नहीं, सोच असली हादसों की वजह बन जाती है।




