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अनंत सिंह के समर्थन में प्रचार करना पड़ा भारी—ललन सिंह और सम्राट चौधरी पर केस दर्ज, बिहार में चुनावी बवाल तेज

पटना 4 नवंबर 2025

बिहार की सियासत में बाहुबली नेताओं के नाम हमेशा विवाद और राजनीतिक उथल-पुथल का केंद्र रहे हैं। इसी कड़ी में अब जदयू के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ ललन सिंह और उप मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी खुद कानूनी जाल में फंसते नजर आ रहे हैं। आरोप है कि दोनों नेताओं ने मोकामा के कुख्यात बाहुबली और पूर्व विधायक अनंत सिंह के पक्ष में खुले तौर पर चुनावी प्रचार किया, जबकि अनंत सिंह पर गंभीर आपराधिक मुकदमें दर्ज हैं और वह चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित किए जा चुके हैं। ऐसे में उनके समर्थन में प्रचार करना चुनाव आचार संहिता और जनप्रतिनिधित्व कानून के उल्लंघन के दायरे में आ गया है। अब इस मामले में दर्ज हुई एफआईआर ने बिहार के चुनावी मौसम में आग लगा दी है।

जानकारी के अनुसार, यह पूरा मामला मोकामा में आयोजित एक चुनावी सभा का है, जहां मंच से ललन सिंह और सम्राट चौधरी ने अनंत सिंह के प्रति राजनीतिक समर्थन व्यक्त करते हुए लोगों को उनके पक्ष में वोट करने का संदेश दिया। शिकायतकर्ता की ओर से कहा गया है कि यह कदम कानून की खुली अवहेलना है, क्योंकि जिस व्यक्ति पर संगीन आपराधिक आरोप हों और अदालत ने जिसे चुनावी अधिकार से वंचित किया हो, उसके समर्थन में राजनीतिक गतिविधियां करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के खिलाफ है। इस आधार पर दोनों नेताओं के खिलाफ धारा 188 समेत जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत कार्रवाई की मांग की गई है।

विपक्ष ने इस घटना को लेकर सत्तारूढ़ दल पर हमला तेज कर दिया है। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस ने आरोप लगाया है कि भाजपा और जदयू नेताओं की कथनी और करनी में जमीन-आसमान का अंतर है। जब विपक्ष किसी विवादित व्यक्ति के साथ दिख जाए तो सत्ता पक्ष कानून-व्यवस्था का दावा करता है, मगर वही लोग खुद ऐसे आरोपियों के साथ मंच साझा करते हैं तो इसे “राजनीतिक मजबूरी” का नाम दे देते हैं। विपक्ष ने सवाल उठाया कि क्या यही है मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का “सुशासन मॉडल”? क्या अब अपराधियों के समर्थन और संरक्षण से ही वोट जुटाए जाएंगे?

इस बवाल के बीच राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बिहार में बाहुबली नेताओं की पकड़ आज भी मजबूत है और चुनाव आते ही कई दल वोटों के लालच में ऐसे चेहरों को नजरअंदाज कर देते हैं। मोकामा और आसपास के क्षेत्रों में अनंत सिंह का प्रभाव किसी से छिपा नहीं, और यही कारण है कि बड़े नेता भी जोखिम उठाने को तैयार दिखाई देते हैं। लेकिन इस बार मामला उल्टा पड़ता नजर आ रहा है, क्योंकि कानूनी कार्रवाई की आंच अब सीधे राज्य के शीर्ष नेताओं तक पहुँच गई है।

एफआईआर दर्ज होने के बाद भी सम्राट चौधरी और ललन सिंह ने आक्रामक रुख अपनाए रखा है। उन्होंने कहा कि यह विपक्ष का सस्ता राजनीतिक स्टंट है और वे किसी भी जांच का सामना करने के लिए तैयार हैं। हालांकि चुनाव आयोग की निगाहें अब इस पूरे प्रकरण पर टिकी हुई हैं और आने वाले दिनों में स्थिति और गर्म होने वाली है। बिहार के वोटरों के लिए यह दृश्य कोई नया नहीं, लेकिन इस बार मामला मात्र प्रचार का नहीं बल्कि व्यवस्था और कानून के खुले उल्लंघन का है, जिसका असर चुनावी नतीजों पर भी पड़ सकता है।

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