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भारतीय खेल जगत में अल्पसंख्यक खिलाड़ियों के प्रति पूर्वाग्रह और दुर्व्यवहार

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स्पोर्ट्स डेस्क 3 नवंबर 2025

भारतीय खेल संस्कृति में एक गहरा विरोधाभास मौजूद है, जहाँ राष्ट्रीय टीमों में अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाड़ियों की प्रतिभा और समर्पण को एक ओर सराहा जाता है, वहीं दूसरी ओर उनके प्रदर्शन को अक्सर धार्मिक चश्मे से देखा जाता है। यह प्रवृत्ति विशेष रूप से उन हाई-वोल्टेज मैचों के बाद खुलकर सामने आती है जो देश की राष्ट्रीय भावना से गहरे जुड़े होते हैं, और इसमें कोई संदेह नहीं कि यह एक ऐसी सांप्रदायिक पूर्वाग्रह की अभिव्यक्ति है जो दशकों से खेल जैसे राष्ट्रीय एकता के मंच को भी प्रभावित कर रही है। जब ये खिलाड़ी, विशेष रूप से मुस्लिम समुदाय से आने वाले एथलीट्स, प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाफ मैचों में अपेक्षाओं के अनुरूप प्रदर्शन नहीं कर पाते या टीम की हार का कारण बनते हैं, तो उन्हें न केवल खेल के मानदंडों के आधार पर आलोचना झेलनी पड़ती है, बल्कि उन्हें धार्मिक आधार पर अपशब्द और गालियों का सामना भी करना पड़ता है। पूर्व क्रिकेट कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन, जिन्होंने 1990 के दशक में टीम का नेतृत्व किया, ने स्वयं ऐसे अनुभवों का उल्लेख किया है, जहाँ एक महत्वपूर्ण श्रृंखला में खराब प्रदर्शन के बाद स्टेडियमों में उन्हें ‘पाकिस्तानी एजेंट’ या ऐसे ही अपमानजनक नारों से संबोधित किया गया, जो स्पष्ट रूप से उनकी देशभक्ति पर सवाल उठाते थे, भले ही उन्होंने देश के लिए शानदार शतक जमाया हो या लंबे समय तक टीम की कप्तानी की हो। यह व्यवहार खेल की भावना के विपरीत है और उस दक्षिणपंथी विचारधारा से प्रेरित होता है जो खेल को राष्ट्रवाद का प्रतीक बताते हुए अल्पसंख्यक खिलाड़ियों की निष्ठा को संदेह की दृष्टि से देखती है।

सोशल मीडिया पर भारतीय महिला क्रिकेटर जेमिमा रोड्रिग्स के खराब प्रदर्शन को लेकर कुछ आपत्तिजनक और असंवेदनशील टिप्पणियाँ की जा रही हैं। कई यूज़र्स ने उनके नाम “जेमिमा” और “Jesus” को जोड़ते हुए धार्मिक व्यंग्य किए, जैसे — “What happened to Jesus today?”, “Jesus didn’t help today?”, और “Being Sunday, Jesus is on holiday।” एक ने लिखा है कि 

आज जीसस खाकी यानी (हिन्दू) के साथ है। यह प्रवृत्ति न केवल खिलाड़ी के प्रदर्शन का मज़ाक उड़ाती है, बल्कि धार्मिक भावनाओं को भी ठेस पहुँचाने वाली है। खेल में हार-जीत सामान्य बात है, लेकिन किसी की आस्था या पहचान को निशाना बनाना खेल भावना और सामाजिक मर्यादा के विरुद्ध है। लोग इतनी जल्दी ये भी भूल गए कि इसी खिलाड़ी ने ऑस्ट्रेलिया के साथ महत्वपूर्ण सेमीफाइनल जिताया था नाबाद 127 रनों की शानदार पारी खेल कर। जेमिमा के कारण ही फाइनल में भारत 341 रन बना कर फाइनल 

यह सांप्रदायिक प्रवृत्ति केवल क्रिकेट तक सीमित नहीं है, बल्कि हॉकी जैसे अन्य राष्ट्रीय खेलों में भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हॉकी के दिग्गज, जैसे जफर इकबाल (1980 मॉस्को ओलंपिक स्वर्ण पदक विजेता टीम के कप्तान) और मोहम्मद शाहिद (उसी टीम के स्टार फॉरवर्ड), ने भी अपने करियर के दौरान महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मैचों, खासकर एक चिर-प्रतिद्वंद्वी टीम के खिलाफ, में किसी भी असफलता या मामूली गलती के लिए दर्शकों से धार्मिक और अपमानजनक टिप्पणियां झेलीं।

मोहम्मद शाहिद को कथित तौर पर ‘एजेंट’ कहकर पुकारा जाना या उनकी निष्ठा पर सवाल उठाना यह प्रमाणित करता है कि अल्पसंख्यक समुदाय के खिलाड़ियों के प्रति यह पूर्वाग्रह कितना गहरा है। यह उत्पीड़न केवल व्यक्तिगत नहीं था, बल्कि यह उस व्यापक मानसिकता का प्रमाण था जो देश में एक लंबे समय से सक्रिय रही है और अब राजनीतिक संरक्षण पाकर तथा सोशल मीडिया के माध्यम से और अधिक मजबूत हो गई है। यह गुट खेल की उपलब्धियों को सांप्रदायिक रंग में रंगने में संकोच नहीं करता, जिससे देश की राष्ट्रीय एकता को गंभीर ठेस पहुँचती है। 

इतिहासकारों और खेल पत्रकारों द्वारा दर्ज किया गया है कि 1980-90 के दशक में महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मैचों के दौरान मुस्लिम खिलाड़ियों के खिलाफ स्टेडियमों में धार्मिक नारे लगना आम था। यह व्यवहार युवा पीढ़ी में यह संदेश देता है कि जीत का श्रेय सिर्फ बहुसंख्यक समुदाय को देना ही ‘राष्ट्रवादी’ है, अन्यथा खिलाड़ी की निष्ठा हमेशा संदेहास्पद बनी रहेगी।

यह सांप्रदायिक रणनीति केवल खराब प्रदर्शन पर दुर्व्यवहार तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक अभिव्यक्तियों के मामले में दोहरा मापदंड अपनाकर खेल के क्षेत्र को भी ध्रुवीकृत करने का काम करती है। यह व्यवहार भारतीय संविधान की धर्मनिरपेक्षता को सीधी चुनौती देता है। उदाहरण के तौर पर, यदि ईसाई समुदाय से आने वाली भारतीय महिला क्रिकेटर जेमिमा रॉड्रिग्स एक महत्वपूर्ण मैच जिताने वाली पारी के बाद अपनी जीत का श्रेय जीसस को देते हुए बाइबल की कोई पंक्ति साझा करती हैं, तो राइट विंग ट्रोल्स और समर्थक हैंडल्स इसे अक्सर ‘ईसाई प्रचार’ या ‘भारतीय संस्कृति पर हमला’ कहकर ट्रोल करते हैं, जैसा कि उनकी धार्मिक गतिविधियों को लेकर पूर्व में विवादों में देखा गया है।

इसके विपरीत, जब निशानेबाज मनु भाकर 2024 पेरिस ओलंपिक में पदक जीतने के बाद इंस्टाग्राम पर भगवद्गीता की पंक्ति ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ साझा करती हैं, तो सत्तारूढ़ दल के नेता और पार्टी के आधिकारिक हैंडल्स इसे ‘हिंदू संस्कृति की जीत’ बताकर सराहते हैं, और #GitaInOlympics जैसे हैशटैग ट्रेंड करवाते हैं।

यह स्पष्ट रूप से दोहरा मापदंड दर्शाता है: दोनों ही एथलीट्स अपनी व्यक्तिगत आस्था से प्रेरणा ले रही थीं, लेकिन राइट विंग को केवल हिंदू धर्म की अभिव्यक्ति राष्ट्रवादी लगती है जबकि अन्य की अभिव्यक्ति को वे विदेशी प्रभाव या प्रचार मानते हैं। यह मानसिकता खेल जैसे क्षेत्र में, जहाँ पूरा देश एकजुट होता है, विभाजन के बीज बोती है और देश की धर्मनिरपेक्ष छवि को धूमिल करती है।

यह राजनीतिकरण केवल धार्मिक अभिव्यक्ति या खराब प्रदर्शन पर नहीं रुकता, बल्कि एक सुनियोजित पैटर्न के तहत समाज के हर क्षेत्र में घोलता है। 2022 राष्ट्रमंडल खेलों में मुस्लिम बॉक्सर मोहम्मद हुसामुद्दीन ने जीत के बाद अल्लाह को शुक्रिया कहा तो राइट विंग सोशल मीडिया हैंडल्स ने इसे ‘जिहादी प्रचार’ कहकर बॉयकॉट की मांग की। 

इसके विपरीत, जेवलिन थ्रोअर नीरज चोपड़ा ने 2021 टोक्यो ओलंपिक में ऐतिहासिक स्वर्ण जीतने के बाद हनुमान चालीसा का जिक्र किया तो सत्तारूढ़ दल की आईटी सेल ने इसे ‘राम राज्य की वापसी’ बताकर महिमामंडित किया। यह दोहरा पैटर्न दिखाता है कि राइट विंग की नजर में देश की 140 करोड़ आबादी में से केवल बहुसंख्यक समुदाय की आस्था और उसकी अभिव्यक्ति ही राष्ट्रवादी स्वीकार्यता पाती है।

यह धार्मिक विभाजन देश की राष्ट्रीय एकता को भीतर से खोखला कर रहा है, और इतिहास की तरह यह देश को कमजोर कर रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि धार्मिक हेट क्राइम्स में वृद्धि हुई है, जो सांप्रदायिक तनाव के बढ़ने का सबूत है। खेल जैसे गैर-राजनीतिक क्षेत्र में इस तरह का ज़हर घोलकर, यह गुट यह साबित करता है कि वह देश का रक्षक नहीं, बल्कि राजनीतिक लाभ के लिए विभाजक है, जिससे भारत की विविधता, जो उसकी सबसे बड़ी ताकत है, खतरे में पड़ रही है।

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