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RJD और कांग्रेस पर नहीं, ‘कट्टेबाजी’ का कटाक्ष खुद मोदी के अतीत पर वार करता है

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नई दिल्ली 3 नवंबर 2025

बिहार की चुनावी रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर अपने तीखे और नाटकीय अंदाज़ में हमला बोला। उन्होंने कहा — “राजद ने कांग्रेस की कनपटी पर कट्टा रखकर मुख्यमंत्री पद चोरी कर लिया।” यह बयान केवल राजनीतिक व्यंग्य नहीं था, बल्कि चुनावी भाषा की गिरावट का प्रतीक भी था। देश के सर्वोच्च पद पर बैठे व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वे संवाद में मर्यादा रखें, परंतु बार-बार ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री का शब्दकोष अब राजनीतिक मर्यादा से नहीं, बल्कि भीड़ की तालियों से संचालित होता है। यह वही शैली है, जिसमें गंभीर मुद्दे हास्य और आक्रोश के बीच खो जाते हैं।

इस बयान पर राष्ट्रीय जनता दल के सांसद और प्रवक्ता मनोज कुमार झा ने जिस अंदाज़ में पलटवार किया, वह न केवल व्यंग्यपूर्ण था, बल्कि ऐतिहासिक संदर्भों से भरा हुआ था। उन्होंने लिखा — “भाइयों-बहनों, यह हमारे देश के प्रधानमंत्री जी की भाषा का एक उदाहरण है। अगर ‘कट्टा’ प्रतीक के रूप में भी इस्तेमाल किया गया है तो हमें गोवा में भाजपा की 2013 की वह मीटिंग याद आती है जिसमें ‘सार्वजनिक कट्टेबाजी’ से अन्य वरिष्ठों को दरकिनार कर शीर्ष कुर्सी हथियाई गई थी।”

मनोज झा का यह कथन सीधे तौर पर उस ऐतिहासिक क्षण की ओर इशारा करता है जब भाजपा के भीतर सत्ता संघर्ष चरम पर था। उस समय लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, सुषमा स्वराज और यशवंत सिन्हा जैसे दिग्गज नेताओं को दरकिनार करते हुए नरेंद्र मोदी को “प्रधानमंत्री पद का चेहरा” घोषित कर दिया गया था — वह भी ऐसे माहौल में, जब पार्टी में एकता से ज्यादा अंदरूनी खींचतान थी।

मनोज झा का ‘कट्टा’ रूपक असल में सत्ता के उस कट्टेबाज दौर की याद दिलाता है जब लोकतांत्रिक विमर्श की जगह राजनीतिक षड्यंत्र ने ले ली थी। 2013 की गोवा बैठक में जो हुआ, वह भारतीय राजनीति में एक मोड़ था — जहाँ संगठनवाद की जगह व्यक्तिवाद ने कब्जा कर लिया। भाजपा उस दिन से एक व्यक्ति की पार्टी बनकर रह गई। “कट्टेबाजी” अगर प्रतीक है सत्ता हथियाने की, तो सबसे बड़ा उदाहरण खुद मोदी युग की शुरुआत ही है।

आज जब प्रधानमंत्री लालू यादव या राजद पर ‘कट्टा रखकर कुर्सी छीनने’ का आरोप लगाते हैं, तो सवाल उठना लाजमी है — क्या राजनीति में नैतिकता का अधिकार केवल सत्ता में बैठे व्यक्ति को है? क्या भाजपा को भूल गया है कि 2013 में अपने ही वरिष्ठ नेताओं को अपमानित कर कुर्सी हथियाना “लोकतांत्रिक अधिकार” नहीं, बल्कि राजनीतिक जबरदस्ती का सबसे बड़ा उदाहरण था?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मोदी की यह बयानबाजी दरअसल जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाने की रणनीति है — बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों पर बात करने के बजाय अब भाषाई कटाक्ष ही राजनीति का मुख्य हथियार बन गया है। लेकिन इस बार बिहार की जनता के सामने मनोज झा का जवाब एक दर्पण की तरह खड़ा है — जिसमें “कट्टा” दिखाने वाला खुद अपनी पुरानी छवि देख रहा है।

सवाल यह नहीं कि किसने किसकी कनपटी पर कट्टा रखा, सवाल यह है कि आज भारत की लोकतांत्रिक राजनीति की कनपटी पर सत्ता का अहंकार किस तरह रखा गया है। और यह सच किसी से छिपा नहीं कि इस हथियार का ट्रिगर 2013 में ही दब चुका था।

 

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