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वोट की कीमत दस हज़ार रुपये?— बिहार की ‘डबल इंजन सरकार’ का चुनावी जुगाड़ और लोकतंत्र की नीलामी

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पटना / नई दिल्ली 2 नवंबर 2025

लोकतंत्र की आत्मा तब आहत होती है जब सत्ता में बैठी सरकारें जनता की सेवा नहीं, बल्कि उसके विवेक की खरीद-फरोख्त में जुट जाती हैं। बिहार में आज यही हो रहा है। चुनाव आचार संहिता लागू होने के बावजूद, बिहार की डबल इंजन सरकार ने महिलाओं के खातों में दस-दस हज़ार रुपये डालकर न सिर्फ़ नैतिकता को ठेंगा दिखाया है, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के मुताबिक, बीते कल लगभग 10 लाख महिलाओं को ₹10,000 की छठी किस्त दी गई, और अगली किस्त 7 नवंबर को, यानी मतदान से सिर्फ चार दिन पहले, दी जानी है। सवाल सीधा है — जब चुनाव घोषित हो चुके हैं, आचार संहिता लागू है, तो फिर यह ‘चुनावी रिश्वत’ नहीं तो क्या है?

सरकार और चुनाव आयोग के कुछ सूत्र इस कार्रवाई को “ongoing scheme” कहकर बचाव की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह तर्क उतना ही खोखला है जितना यह दावा कि यह योजना चुनाव से पहले शुरू हुई थी। तथ्य साफ़ हैं — यह स्कीम एक सप्ताह पहले शुरू की गई, और पहले ही चरण में इसकी तीन किस्तें चुनाव अवधि में जारी की गईं। ऐसे में इसे “चल रही योजना” बताना जनता की आंखों में धूल झोंकने जैसा है। सवाल यह भी उठता है कि अगर यह वास्तव में कोई नियमित योजना होती, तो इसकी घोषणा और भुगतान महीनों पहले क्यों नहीं हुए? क्या यह महज़ संयोग है कि भुगतान का समय मतदान की तारीख़ों से ठीक पहले तय किया गया? या फिर यह सुनियोजित “वोट प्रबंधन” की सरकारी चाल है?

बिहार में जो हो रहा है, वह सिर्फ़ स्थानीय नहीं है — यह एक राष्ट्रीय प्रवृत्ति बनती जा रही है। देशभर में चुनावी मौसम आते ही “जनकल्याण” की आड़ में “वोट खरीदो, सत्ता बचाओ” की नीति खुलकर चलती है। कभी मुफ़्त राशन के नाम पर, कभी सस्ती गैस के बहाने, और कभी सीधे बैंक खातों में पैसे डालकर। इन योजनाओं का उद्देश्य नागरिकों को सशक्त बनाना नहीं, बल्कि उन्हें निर्भर और कृतज्ञ बनाए रखना है। सत्ता का यह मनोविज्ञान साफ़ है — गरीबी को मिटाना नहीं, गरीब को मोहरा बनाना है।

बिहार की सरकार, जो खुद को “डबल इंजन” कहती है, आज दोनों इंजनों से सिर्फ़ भ्रष्टाचार और राजनीतिक गणित का धुआं निकाल रही है। भ्रष्टाचार अब यहां सत्ता की संस्कृति बन चुका है। प्रशासनिक स्तर पर हर योजना ‘कमीशन’ और ‘कलेक्शन’ की जकड़ में है। सड़क से लेकर स्कूल, स्वास्थ्य से लेकर सिंचाई तक — हर क्षेत्र में भ्रष्टाचार ने गहरी जड़ें जमा ली हैं। “महिलाओं के सशक्तिकरण” का नारा भी अब वोटों के सौदे का माध्यम बन गया है। गरीब महिलाओं के खाते में पैसा भेजकर सरकार अपनी असफल नीतियों को छुपाने की कोशिश कर रही है।

यह सवाल सिर्फ़ बिहार का नहीं, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक तंत्र का है। क्या हम उस स्थिति में पहुंच चुके हैं, जहाँ वोट अब एक नागरिक का अधिकार नहीं, बल्कि एक बिकाऊ वस्तु बन गया है? क्या चुनाव अब नीतियों की प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि नोटों की नीलामी बन गए हैं? चुनाव आयोग की चुप्पी और “ongoing scheme” जैसी सफाई इस पूरे खेल की सबसे दुखद कड़ी है। जब चुनाव की निगरानी करने वाला संस्थान ही सत्ता की भाषा बोलने लगे, तो निष्पक्षता की उम्मीद कहाँ बचेगी?

बिहार की यह “वोट किस्त योजना” हमें याद दिलाती है कि भारत में अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ़ “वोट डालने” की नहीं, बल्कि “वोट को बचाने” की है। गरीब की जेब में दस हज़ार डालकर अगर कोई सरकार उसके विवेक की आवाज़ को दबा देती है, तो यह सिर्फ़ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या है।

वोट खरीदे जा सकते हैं, लेकिन विवेक नहीं। और जब जनता अपने विवेक के साथ खड़ी होती है, तो सत्ता की सबसे बड़ी चाल भी ध्वस्त हो जाती है। सवाल अब जनता के सामने है — क्या वह अपना वोट देगी या बेच देगी?

बिहार की यह “वोट किस्त योजना” हमें याद दिलाती है कि भारत में अब लोकतंत्र की सबसे बड़ी लड़ाई सिर्फ़ “वोट डालने” की नहीं, बल्कि “वोट को बचाने” की है। गरीब की जेब में दस हज़ार डालकर अगर कोई सरकार उसके विवेक की आवाज़ को दबा देती है, तो यह सिर्फ़ भ्रष्टाचार नहीं, बल्कि लोकतंत्र की हत्या है।

वोट खरीदे जा सकते हैं, लेकिन विवेक नहीं। और जब जनता अपने विवेक के साथ खड़ी होती है, तो सत्ता की सबसे बड़ी चाल भी ध्वस्त हो जाती है। सवाल अब जनता के सामने है — क्या वह अपना वोट देगी या बेच देगी?

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