नई दिल्ली 2 नवंबर 2025
दिल्ली की दमघोंटू हवा से राहत दिलाने के लिए दिल्ली सरकार द्वारा किए गए 34 करोड़ रुपये के क्लाउड सीडिंग प्रयोग को लेकर अब बड़ा वैज्ञानिक विवाद खड़ा हो गया है। हाल ही में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) दिल्ली के प्रतिष्ठित Centre for Atmospheric Sciences (CAS) ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जिसमें साफ़ कहा गया है कि सर्दियों में क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) से दिल्ली के वायु प्रदूषण में कोई उल्लेखनीय सुधार संभव नहीं है। रिपोर्ट के अनुसार, यह प्रयोग वैज्ञानिक दृष्टि से अप्रभावी, अल्पकालिक और संसाधनों की बर्बादी है।
दिल्ली सरकार ने सर्दियों में प्रदूषण घटाने के उद्देश्य से यह महंगा ‘मेघ प्रयोग’ शुरू किया था। लेकिन इस पहल की जड़ें पहले ही सवालों में थीं। दरअसल, 5 दिसंबर 2024 को राज्यसभा में उठे प्रश्न संख्या 1166 के जवाब में केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन राज्य मंत्री श्री किर्ति वर्धन सिंह ने स्पष्ट किया था कि तीन प्रमुख वैज्ञानिक एजेंसियों — भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB), और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) — ने सर्दियों के दौरान क्लाउड सीडिंग से प्रदूषण नियंत्रण की संभावना को खारिज कर दिया था। इन संस्थाओं ने अपने अध्ययन में बताया था कि सर्दियों के बादल मुख्यतः पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) के कारण बनते हैं, जो बहुत कम समय तक टिकते हैं और ऊंचाई पर रहते हैं, जिससे क्लाउड सीडिंग तकनीकी रूप से असंभव हो जाती है।
अब 31 अक्टूबर 2025 को आईआईटी दिल्ली की ताज़ा रिपोर्ट ने इस विषय पर और भी गहराई से रोशनी डाली है। “Can Cloud Seeding Help Tackle Delhi’s Air Pollution?” शीर्षक से जारी इस रिपोर्ट में 25 शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों की टीम ने निष्कर्ष निकाला कि सर्दियों में क्लाउड सीडिंग का प्रभाव सीमित क्षेत्र में अधिकतम एक-दो दिनों तक मामूली सुधार तक ही सीमित रहेगा। रिपोर्ट में कहा गया कि “यह एक दिखावटी उपाय है, जो जनधारणा को तसल्ली देने के लिए किया जाता है, न कि वास्तविक समाधान के लिए।” इसमें यह भी कहा गया है कि दिल्ली की हवा को शुद्ध करने के लिए असली काम “नीचे की ज़मीन पर” होना चाहिए — यानी वाहनों के उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण और पराली जलाने पर कठोर नियंत्रण।
दिल्ली सरकार का यह प्रयोग, जो अब वैज्ञानिक रूप से ‘अप्रभावी’ घोषित हो चुका है, यह दिखाता है कि कैसे नीतिगत निर्णय कभी-कभी विज्ञान से ज़्यादा राजनीतिक दबाव और जनछवि पर आधारित हो जाते हैं। सर्दियों की गंदी हवा में थोड़ी-सी नमी और कुछ बूंदों की बारिश को “बड़ी राहत” बताना असल में उस जनता के साथ क्रूर मज़ाक है जो हर दिन ज़हरीली हवा में सांस ले रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि 34 करोड़ रुपये से अगर सरकार चाहती, तो वह वायु शोधन इकाइयाँ, सार्वजनिक परिवहन सुधार, या औद्योगिक उत्सर्जन नियंत्रण जैसी दीर्घकालिक योजनाओं में निवेश कर सकती थी — जो प्रदूषण घटाने में कहीं अधिक कारगर साबित होतीं।
दिल्ली का प्रदूषण हर साल की तरह इस बार भी चरम पर है। PM 2.5 और PM 10 के स्तर विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की सीमा से कई गुना ऊपर हैं, और एयर क्वालिटी इंडेक्स लगातार “गंभीर” श्रेणी में दर्ज हो रहा है। ऐसे में क्लाउड सीडिंग जैसे ‘नाटकीय उपाय’ जनता को राहत नहीं, बल्कि भ्रम दे रहे हैं। सवाल यह है कि जब देश की सबसे बड़ी वैज्ञानिक संस्थाएँ — IIT Delhi, IMD और CPCB — पहले ही इसकी निष्क्रियता पर मुहर लगा चुकी हैं, तो फिर यह प्रयोग क्यों किया गया?
सरकार को अब यह समझना होगा कि प्रदूषण से जंग आसमान में नहीं, ज़मीन पर जीतनी है। बूंदों का इंतज़ार छोड़, नीति और नीयत में बदलाव ही दिल्ली को सांस लेने लायक बना सकता है। फिलहाल, यह ‘मेघ प्रयोग’ विज्ञान की नहीं, राजनीति की बारिश साबित हुआ है।




