चेन्नई 2 नवंबर 2025
चेन्नई में एक दिलचस्प कानूनी मोड़ सामने आया है, जहां पूर्व आईपीएस अधिकारी जी. संपथकुमार ने अदालत में उस आदेश को चुनौती दी है जिसके तहत महेंद्र सिंह धोनी का बयान दर्ज करने के लिए एक अधिवक्ता आयुक्त (Advocate Commissioner) नियुक्त किया गया था। यह मामला उस मानहानि मुकदमे से जुड़ा है जिसे भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान एम.एस. धोनी ने संपथकुमार के खिलाफ दायर किया था। धोनी ने आरोप लगाया था कि आईपीएस अधिकारी ने 2013 के आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले से संबंधित जांच के दौरान उनके खिलाफ झूठे और अपमानजनक बयान दिए, जिससे उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा। अब, इस कानूनी विवाद में संपथकुमार द्वारा दायर अपील ने नया अध्याय खोल दिया है।
संपथकुमार ने अपनी अपील में कहा है कि अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति की कोई आवश्यकता नहीं थी क्योंकि धोनी खुद अदालत में पेश होकर बयान दे सकते हैं। उन्होंने दलील दी कि यह व्यवस्था “न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग” है और इससे मुकदमे की निष्पक्षता पर सवाल उठ सकते हैं। उनकी ओर से दाखिल याचिका में कहा गया कि इस तरह का कदम “विशेष रियायत” जैसा प्रतीत होता है, जो न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप नहीं है। वहीं, धोनी के वकीलों का तर्क है कि यह प्रक्रिया कानूनी रूप से पूरी तरह वैध है, क्योंकि अदालत ने इसे सुविधाजनक और व्यावहारिक मानते हुए ऐसा आदेश दिया था।
धोनी ने 2014 में संपथकुमार के खिलाफ यह मानहानि मामला दायर किया था, जब आईपीएस अधिकारी ने अपने एक बयान में दावा किया था कि 2013 के आईपीएल सट्टेबाज़ी और फिक्सिंग कांड की जांच के दौरान धोनी का नाम भी सामने आया था। धोनी ने इन आरोपों को “झूठा, बेबुनियाद और उनकी छवि को धूमिल करने वाला” बताया था। अदालत में दाखिल अपने हलफनामे में उन्होंने कहा था कि उनकी छवि एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी और भारत के सम्मानित कप्तान के रूप में बर्बाद करने की कोशिश की गई।
इस मामले में अब तक कई सुनवाइयां हो चुकी हैं और अदालत ने हाल ही में अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति कर धोनी का बयान दर्ज कराने का आदेश दिया था। परंतु संपथकुमार की इस नई अपील से मामला और जटिल हो गया है। उनके वकीलों का कहना है कि “एक व्यक्ति, चाहे वह कितना भी प्रसिद्ध क्यों न हो, कानून से ऊपर नहीं है। अदालत में सभी के लिए समान प्रक्रिया होनी चाहिए।” यह तर्क अब न्यायपालिका के समक्ष एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है कि क्या सार्वजनिक हस्तियों को कानूनी प्रक्रियाओं में विशेष सुविधा दी जानी चाहिए।
दूसरी ओर, धोनी के कानूनी प्रतिनिधियों ने इस अपील को “विलंब की रणनीति” करार दिया है। उनका कहना है कि संपथकुमार जानबूझकर प्रक्रिया को लंबा खींचने की कोशिश कर रहे हैं ताकि मुकदमे का निपटारा देर से हो। धोनी के वकीलों ने अदालत से अपील की है कि न्याय में देरी उनके मुवक्किल की प्रतिष्ठा को और अधिक नुकसान पहुंचा रही है और यह उनके लिए मानसिक उत्पीड़न का कारण बन रहा है।
अब सभी की निगाहें मद्रास हाई कोर्ट पर टिकी हैं, जहां यह अपील सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है। अदालत को यह तय करना होगा कि अधिवक्ता आयुक्त की नियुक्ति कानूनी और उचित है या नहीं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आने वाले समय में सार्वजनिक हस्तियों से जुड़े मानहानि मामलों के लिए एक मिसाल बन सकता है।
मुकदमे की जड़ में भले ही 2013 का पुराना स्पॉट फिक्सिंग विवाद हो, लेकिन आज यह मुद्दा न्यायिक मर्यादाओं, समानता और मीडिया नैतिकता से जुड़ गया है। एक ओर देश के सबसे सम्मानित क्रिकेटरों में से एक महेंद्र सिंह धोनी हैं, तो दूसरी ओर एक पूर्व आईपीएस अधिकारी, जिन्होंने जांच के दौरान अपने कर्तव्यों का हवाला देकर बयान दिए थे। इस कानूनी संघर्ष ने अब अदालत के सामने एक जटिल सवाल रख दिया है — कितनी सीमा तक कोई अधिकारी “जांच का हिस्सा” कहकर सार्वजनिक रूप से बयान दे सकता है, और कितनी हद तक किसी की प्रतिष्ठा को बिना साक्ष्य के ठेस पहुंचाना अपराध बन जाता है।
अगली सुनवाई में अदालत का रुख यह तय करेगा कि क्या यह मामला जल्द निपटता है या फिर कानूनी पेचीदगियों में उलझकर लंबा खिंच जाएगा। फिलहाल इतना तय है कि धोनी बनाम संपथकुमार की यह जंग केवल अदालत तक सीमित नहीं, बल्कि साख, मर्यादा और कानून के सिद्धांतों की भी परीक्षा बन चुकी है।




