नई दिल्ली 29 अक्टूबर 2025
हाल के वर्षों में कई हाई कोर्ट जजों के तबादलों ने देश में न्यायपालिका की पारदर्शिता और स्वतंत्रता को लेकर नई बहसें छेड़ दी हैं। आम जनता के मन में सवाल उठता है कि आखिर हाई कोर्ट के जजों का ट्रांसफर क्यों किया जाता है, क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक दबाव होता है, या फिर यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया है? इस पूरे तंत्र की जड़ संविधान के अनुच्छेद 222 (Article 222 of the Indian Constitution) में निहित है, जो राष्ट्रपति को यह अधिकार देता है कि वह एक हाई कोर्ट के जज को दूसरे हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर सके। लेकिन यह अधिकार एक प्रक्रिया के तहत लागू होता है — जिसमें सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश (CJI) से अनिवार्य रूप से परामर्श लिया जाता है।
अनुच्छेद 222 की मूल भावना यह थी कि न्यायपालिका में कार्यशीलता और निष्पक्षता बनी रहे। भारत के संविधान निर्माताओं ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई ताकि कोई भी जज लंबे समय तक एक ही प्रदेश या क्षेत्र में कार्यरत रहकर स्थानीय राजनीति या सामाजिक प्रभाव से प्रभावित न हो। यह भी एक तरीका था कि देश के विभिन्न न्यायालयों में अनुभव और दृष्टिकोण का आदान-प्रदान हो, जिससे न्याय प्रणाली अधिक सशक्त और संतुलित बन सके। संविधान में स्पष्ट लिखा है — “राष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद, किसी एक हाई कोर्ट के न्यायाधीश को दूसरे हाई कोर्ट में स्थानांतरित कर सकता है।” इसके अलावा, जब तक संसद इस संबंध में कोई कानून नहीं बनाती, तब तक राष्ट्रपति आदेश द्वारा ऐसे जज को प्रतिपूर्ति भत्ता (compensatory allowance) दे सकते हैं, ताकि ट्रांसफर से होने वाली असुविधा की पूर्ति हो सके।
हालांकि, इस प्रक्रिया का व्यावहारिक स्वरूप कई बार विवादों का कारण बनता रहा है। अतीत में कई ऐसे उदाहरण हैं जब जजों के ट्रांसफर को “दंडात्मक कार्रवाई” के रूप में देखा गया। कुछ मामलों में कहा गया कि जिन्होंने सरकार या सत्ता के खिलाफ सख्त रुख दिखाया, उन्हें अपेक्षाकृत दूर या कम प्रतिष्ठित हाई कोर्ट भेज दिया गया। यही कारण है कि न्यायिक समुदाय में समय-समय पर यह मांग उठती रही है कि जजों के ट्रांसफर की प्रक्रिया को और अधिक पारदर्शी बनाया जाए।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि “परामर्श” (consultation) शब्द की व्याख्या सबसे जटिल है। क्या सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सहमति अनिवार्य है या केवल राय लेना पर्याप्त है — इस पर कई बार बहस हुई। सुप्रीम कोर्ट ने “थ्री जजेज केस” (Three Judges Cases) में यह स्पष्ट किया कि जजों की नियुक्ति और ट्रांसफर में कोलेजियम सिस्टम की भूमिका सर्वोपरि होगी, और इस प्रणाली में CJI के साथ वरिष्ठतम जजों का पैनल भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल होगा। इसके बावजूद, जब भी कोई ट्रांसफर होता है, तो पारदर्शिता और कारणों को लेकर सवाल उठते ही रहते हैं।
न्यायपालिका के भीतर भी इस विषय को लेकर एक संवेदनशील दृष्टिकोण रहा है। ट्रांसफर केवल “प्रशासनिक सुविधा” के लिए नहीं, बल्कि “न्यायिक स्वायत्तता” को बनाए रखने के लिए होना चाहिए। कई जजों ने यह भी स्वीकार किया है कि स्थानांतरण उनके पारिवारिक और मानसिक जीवन पर असर डालता है, लेकिन न्यायिक कर्तव्य सर्वोपरि होने के कारण वे इसे स्वीकार करते हैं।
आज जब देश न्यायिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तब अनुच्छेद 222 की प्रासंगिकता और अधिक बढ़ जाती है। यह अनुच्छेद न केवल संविधान की प्रशासनिक व्यवस्था को दर्शाता है, इस बात की भी परीक्षा लेता है कि भारत का लोकतंत्र न्यायपालिका को कितनी स्वतंत्रता और सम्मान देता है। ट्रांसफर की प्रक्रिया का उद्देश्य यदि न्याय और निष्पक्षता को बढ़ाना है, तो इसे केवल संवैधानिक औपचारिकता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक ईमानदारी का हिस्सा माना जाना चाहिए। अनुच्छेद 222 हमें याद दिलाता है कि न्यायपालिका की शक्ति केवल उसके फैसलों में नहीं, उसकी नैतिक स्वतंत्रता में निहित है।




