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NRC ने ली जान, BJP की कागज़ी राजनीति बेनक़ाब” — बंगाल में आत्महत्या के बाद ममता बनर्जी का सियासी विस्फोट

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कोलकाता 29 अक्टूबर 2025

पश्चिम बंगाल में NRC (राष्ट्रीय नागरिक पंजी) के नाम पर एक और दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ एक शख्स ने आत्महत्या करने से पहले अपने सुसाइड नोट में साफ़ लिखा — “NRC मेरी मौत के लिए ज़िम्मेदार है,” और इस त्रासदीपूर्ण वाक्य ने अब बंगाल की सियासत में बारूद का काम किया है, जिसके तुरंत बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार और बीजेपी पर सीधा और तीखा वार करते हुए कहा कि “ये NRC नहीं, NRC की राजनीति है जो इंसान की ज़िंदगी ले रही है।” 

ममता बनर्जी ने इस घटना को ‘दिल्ली की राजनीति ने बंगाल का दिल तोड़ दिया’ बताते हुए कहा कि “हर आदमी अब अपने ही देश में अपनी पहचान साबित करने में लगा है, और बीजेपी की कागज़ वाली राजनीति ने आम आदमी का दिल और आत्मा दोनों कुचल दिए हैं,” उन्होंने यह भी कहा कि यह कोई पहली मौत नहीं है, बल्कि असम, त्रिपुरा और अब बंगाल—हर जगह NRC का खौफ लोगों के सिर पर है, जिससे यह मुद्दा अब प्रशासनिक नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट बन चुका है।

टीएमसी नेताओं ने इस घटना को ‘मानसिक यातना का औज़ार’ बताते हुए बीजेपी पर सीधा प्रहार किया कि वे जानबूझकर लोगों को डर और संदेह में जीने को मजबूर कर रहे हैं, और टीएमसी प्रवक्ता ने बयान दिया कि “भाजपा NRC के नाम पर बंगाल में डर फैलाना चाहती है, लेकिन यह राज्य झुकेगा नहीं, क्योंकि नागरिकता कागज़ से नहीं, कर्म से तय होती है।” 

इस बीच मानवाधिकार संगठनों ने भी मृतक के दस्तावेज़ों को लेकर कई दिनों से जारी तनाव की रिपोर्टों पर गहरी चिंता व्यक्त की है। हालाँकि बीजेपी नेताओं ने पलटवार करते हुए ममता पर NRC का राजनीतिकरण करने और डर का माहौल खुद बनाने का आरोप लगाया है, लेकिन वास्तविकता यह है कि बंगाल के कई इलाकों में अब लोग एनआरसी के नाम से कांप रहे हैं और गाँवों में यह चर्चा ज़ोर पकड़ रही है कि “अगर कागज़ नहीं मिले तो क्या हमें भी देश छोड़ना पड़ेगा?”

यह आत्महत्या सिर्फ़ एक व्यक्ति की नहीं, उस आम नागरिक की है जो अपने ही देश में अपने अस्तित्व को साबित करने के बोझ से कुचल गया है, और ममता बनर्जी का यह अंतिम सवाल कि “बीजेपी बताए — क्या हिंदुस्तान में जन्म लेने वाला अब ‘भारतीय’ कहलाने के लिए मर जाए?” स्पष्ट करता है कि NRC अब सिर्फ़ नीति नहीं, मौत की राजनीति बन चुकी है, और यह घटना एक चेतावनी है कि जब नागरिकता राजनीतिक हथियार बन जाए, तब लोकतंत्र अपने ही लोगों की लाशों पर खड़ा होता है।

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