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जैसा ज्ञान, वैसी सोच — और वैसे ही बोल : एंटायर पॉलिटिकल साइंस वाले बोले — ‘गठबंधन नहीं, लठबंधन’

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पटना/ नई दिल्ली 23 अक्टूबर 2025 

बिहार के चुनावी मैदान में जब मुद्दे जनता की तकलीफों, बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और पलायन पर होने चाहिए थे, तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक बार फिर शब्दों की कलाबाज़ी से सुर्खियाँ बटोरने की कोशिश की है। अपने अभियान “मेरा बूथ सबसे मज़बूत” के दौरान कांग्रेस और आरजेडी पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, “जो लोग खुद को गठबंधन कहते हैं, जनता उन्हें लठबंधन कहती है।”

अब यह बयान सिर्फ़ चुनावी व्यंग नहीं, बल्कि उस सोच की झलक है जो सत्ता में रहते हुए भी विपक्ष को मज़ाक और अपमान का विषय समझती है। यही वजह है कि लोग तंज़ कस रहे हैं —”जैसा ज्ञान, वैसी सोच — और वैसे ही बोल!”

प्रधानमंत्री मोदी का यह बयान उनकी प्रसिद्ध “Entire Political Science” डिग्री की याद दिला गया है, जो सोशल मीडिया पर वर्षों से चुटकुलों का विषय रही है। विपक्षी दलों और सोशल मीडिया पर लोगों ने तंज़ किया कि “जब शिक्षा की गहराई सतही हो, तो राजनीतिक भाषा भी लठ का रूप ले लेती है।”

राजनीतिक पर्यवेक्षक मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी अब अपनी पारंपरिक रैली भाषा से बाहर नहीं आ पा रहे। हर चुनाव में “नामकरण की राजनीति” — चाहे वो “महाराष्ट्र में महा ठगबंधन” हो या अब “बिहार में लठबंधन” — यही उनकी रणनीति बन चुकी है। यह रणनीति न तो नीति की बात करती है, न जनहित की। यह केवल शब्दों की तलवार से विरोधियों को हँसी का पात्र बनाने का प्रयास करती है, ताकि असल मुद्दों पर बात न करनी पड़े।

जो प्रधानमंत्री देश में जातीय जनगणना से डरते हैं, वो गठबंधन को लठबंधन कहेंगे ही। उन्हें जनता के जनादेश का नहीं, जनगणना का डर है।” मोदी के पास न बेरोज़गारी का जवाब है, न किसानों के सवालों का — इसलिए “तुकबंदी और तंज़बाज़ी” ही उनका आखिरी हथियार रह गया है।

जनता के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या प्रधानमंत्री के लिए अब राजनीतिक विमर्श का स्तर इतना नीचे गिर चुका है कि विपक्षी दलों को “लठ” से जोड़कर मज़ाक उड़ाना ही चुनावी रणनीति मानी जाएगी?

एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक ने कहा, “प्रधानमंत्री को देश की जनता ने इसलिए चुना था कि वो अर्थव्यवस्था, युवाओं और किसानों के मुद्दे हल करें, लेकिन वो हर बार चुनाव में भाषाई प्रहार कर लोकतांत्रिक बहस को लठमार राजनीति में बदल देते हैं।” कभी वो कहते हैं कि दंगाई कपड़े से पहचाने जा सकते हैं, कभी कहते हैं ये लोग आपका पानी बंद कर देंगे, आपके नल उखाड़ के ले जायेंगे, कभी कहते हैं आपकी बिजली काट देंगे और तार काट के ले जायेंगे, बिजली के खंभे उखाड़ कर ले जायेंगे।

एंटायर पॉलिटिकल साइंस वाले मोदी कितने बुद्धिमान है कि वो कहते हैं कि बादल होगा तो रडार नहीं पकड़ेगा, नाली के गैस से चाय बनती है, एक्स्ट्रा 2ab मिलेगा, कभी पाकिस्तान की यूनिवर्सिटी को बिहार में बता देते हैं तो कभी कुछ तो कभी कुछ और वॉट्सएप यूनिवर्सिटी के ज्ञान का परिचय देते हैं। 

दरअसल, यह सारे बयान उस सत्ताई मानसिकता की झलक है जहाँ सत्ता में बैठे लोग खुद को ‘देश’ समझने लगते हैं और हर असहमति को लठ से कुचलने की बात करने लगते हैं।

मोदी जी का “लठबंधन” वाला तंज़ शायद रैली में तालियाँ बटोर ले, लेकिन यह लोकतंत्र के उस आदर्श को कमज़ोर करता है जहाँ विचारों की लड़ाई तर्कों से लड़ी जाती है, न कि लाठी से।

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