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जब नेता खुद को देश से बड़ा समझने लगे तो लोकतंत्र की जड़ें हिलने लगती हैं…

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भारतीय राजनीति में व्यक्तित्व पूजा और नेता-केन्द्रित संस्कृति अब खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुकी है। जब किसी लोकतांत्रिक देश में एक व्यक्ति को राष्ट्र से ऊपर रखा जाने लगे, तो यह केवल सत्ता का नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा का अपमान होता है। आज भारत की राजनीति में यही खतरा मंडरा रहा है — जब सत्ता का प्रतीक खुद को देश का पर्याय मानने लगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर लगातार यह आरोप लग रहा है कि वे खुद को भारत से बड़ा, और लोकतांत्रिक संस्थाओं से परे समझने लगे हैं। आलोचकों का कहना है कि मोदी की “महानता” की चाह अब उन्हें उस सीमा तक ले आई है, जहां वे न तो संसद के प्रति जवाबदेह दिखते हैं और न जनता की आलोचना को स्वीकार करने को तैयार।

विपक्ष का आरोप है कि मोदी ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की स्वतंत्र नीति को गिरवी रख दिया है। हालिया बयानों में यह दावा किया गया है कि “अमेरिका अब तय करता है कि भारत को क्या करना चाहिए या नहीं।” वहीं चीन के साथ सीमा विवाद पर सरकार की चुप्पी और वास्तविक नियंत्रण रेखा पर जमीन गंवाने के आरोपों ने इस चिंता को और गहरा कर दिया है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि “जब कोई नेता खुद को देश से बड़ा मानने लगता है, तो लोकतंत्र की जड़ें कमजोर पड़ने लगती हैं, क्योंकि तब निर्णय संस्थाओं से नहीं, व्यक्ति की सनक से निकलने लगते हैं।”

सत्तारूढ़ पार्टी के विरोधियों का यह भी कहना है कि मोदी का शासन ‘लोकतंत्र’ के नाम पर ‘व्यक्तित्व पूजा’ में बदल चुका है। “भारत माता की जय” के नारे के बीच “मोदी है तो मुमकिन है” का स्वर यह दर्शाता है कि अब देश और नेता के बीच की रेखा धुंधली पड़ चुकी है।

 वरिष्ठ राजनीतिक पर्यवेक्षक का मानना है कि, “नेता लोकतंत्र की उपज होते हैं, न कि लोकतंत्र नेता की देन। लेकिन जब कोई शासक खुद को राष्ट्र की आत्मा घोषित कर देता है, तब वह लोकतंत्र नहीं, तानाशाही की दहलीज पर होता है।”

आज जरूरत इस बात की है कि भारत फिर से “संविधान के भारत” और “संवेदनशील भारत” के बीच संतुलन खोजे। लोकतंत्र किसी व्यक्ति की उपासना नहीं, बल्कि संस्थाओं की प्रतिष्ठा और जनता की भागीदारी से चलता है।

अगर देश को बचाना है, तो हमें यह याद रखना होगा — भारत किसी एक व्यक्ति से बड़ा है। नेता आएंगे-जाएंगे, लेकिन लोकतंत्र की जड़ें तभी बचेंगी, जब जनता अपने विवेक से तय करेगी कि राष्ट्र किसी नाम या चेहरे से नहीं, बल्कि संविधान और सच्चाई से चलता है।

 

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