एबीसी डेस्क 25 दिसंबर 2025
दक्षिण भारत की सड़कों पर मातम का दिन
दक्षिण भारत के लिए यह दिन सिर्फ़ एक तारीख नहीं, बल्कि शोक और सन्नाटे की तरह दर्ज हो गया। कर्नाटक और तमिलनाडु में हुए दो अलग-अलग भीषण सड़क हादसों ने मिलकर 26 लोगों की जान ले ली। ये मौतें सिर्फ़ आंकड़े नहीं हैं, बल्कि उन परिवारों की टूटी हुई उम्मीदें हैं, जो अपने प्रियजनों के लौटने का इंतज़ार कर रहे थे। किसी घर में सुबह की चाय ठंडी रह गई, तो कहीं त्योहार की खुशियाँ मातम में बदल गईं। एक ही दिन, दो राज्यों में, ज़िंदगी ने बेहद क्रूर रूप दिखा दिया।
कर्नाटक: जलती बस, चीखें और 17 बुझती ज़िंदगियाँ
कर्नाटक के चित्रदुर्ग ज़िले में राष्ट्रीय राजमार्ग-48 पर देर रात जो हुआ, वह किसी डरावने सपने से कम नहीं था। बेंगलुरु से शिवमोगा जा रही एक निजी स्लीपर बस की तेज़ रफ्तार कंटेनर ट्रक से ज़ोरदार टक्कर हो गई। टक्कर के तुरंत बाद बस में आग लग गई। कई यात्री गहरी नींद में थे, कुछ ने उठकर बाहर निकलने की कोशिश की, लेकिन आग की लपटें इतनी तेज़ थीं कि समय ही नहीं मिला।
इस हादसे में अब तक 17 लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है। बस के भीतर जली हुई सीटें, अधजले बैग और पहचान के काग़ज़ इस बात की गवाही दे रहे थे कि यहाँ ज़िंदगी कितनी बेरहमी से थम गई।
बचाव कार्य और अस्पतालों में जंग
हादसे की सूचना मिलते ही पुलिस, दमकल और एंबुलेंस मौके पर पहुँचीं। आग बुझाने और यात्रियों को बाहर निकालने में काफ़ी समय लगा। कई घायलों को गंभीर हालत में नज़दीकी अस्पतालों में भर्ती कराया गया है, जहाँ डॉक्टर उनकी जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं। मृतकों की पहचान का काम जारी है और प्रशासन परिजनों तक सूचना पहुँचाने में जुटा है। हर फोन कॉल के साथ किसी न किसी घर में रोने की आवाज़ गूंज रही है।
तमिलनाडु: टायर फटा, बस बेकाबू हुई और 9 जानें चली गईं
कर्नाटक की त्रासदी की खबर अभी ठंडी भी नहीं पड़ी थी कि तमिलनाडु के कुड्डालोर ज़िले से एक और दिल दहला देने वाली खबर सामने आई। तिरुचिरापल्ली-चेन्नई नेशनल हाईवे पर एक सरकारी बस का टायर अचानक फट गया। बस संतुलन खो बैठी, दूसरी लेन में चली गई और सामने से आ रही दो कारों से टकरा गई। हादसे में 9 लोगों की मौके पर ही मौत हो गई, जबकि कई अन्य घायल हुए हैं। सड़क पर बिखरा मलबा, टूटी गाड़ियाँ और लोगों की चीख-पुकार उस भयावह पल की कहानी सुना रही थीं।
सरकार की प्रतिक्रिया और मुआवज़े का ऐलान
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन ने हादसे पर गहरा शोक जताया और मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देने का ऐलान किया। वहीं कर्नाटक में भी प्रशासन ने जांच के आदेश दे दिए हैं। लेकिन मुआवज़े की रकम उस खालीपन को कैसे भर सकती है, जो किसी मां ने अपने बेटे को खोकर महसूस किया, या किसी बच्चे ने अपने पिता को?
हर हादसे के बाद वही सवाल
इन दोनों घटनाओं ने एक बार फिर वही पुराने, कड़वे सवाल खड़े कर दिए हैं— क्या वाहनों की तकनीकी जांच समय पर हो रही थी? क्या तेज़ रफ्तार और थकान ने इन हादसों को जन्म दिया? क्या सड़क सुरक्षा सिर्फ़ काग़ज़ों तक सीमित है? हर बार की तरह जांच होगी, रिपोर्ट बनेगी, लेकिन क्या अगली जान बच पाएगी—यह सवाल अब भी अनुत्तरित है।
सफ़र जो अधूरा रह गया
इन हादसों में मरने वाले कोई नाम भर नहीं थे। कोई नौकरी से लौट रहा था, कोई रिश्तेदार से मिलने जा रहा था, कोई त्योहार की तैयारी में था। आज उनके घरों में सन्नाटा है, तस्वीरों पर माला है और बच्चों के सवालों का कोई जवाब नहीं। यह खबर सिर्फ़ सड़क दुर्घटना की नहीं, उस लापरवाही, व्यवस्था और हमारी सामूहिक उदासीनता की भी है, जो हर बार किसी नई त्रासदी में बदल जाती है।
एक कड़वी सच्चाई
कर्नाटक और तमिलनाडु की ये मौतें हमें याद दिलाती हैं कि सड़क पर निकला हर इंसान सुरक्षित लौटे—यह कोई लक्ज़री नहीं, उसका अधिकार है। जब तक सुरक्षा को गंभीरता से नहीं लिया जाएगा, तब तक हर नई सुबह किसी और परिवार के लिए आख़िरी खबर बन सकती है।




