अमरनाथ । मुंबई 29 नवंबर 2025
महाराष्ट्र की महायुति सरकार द्वारा महिलाओं को आर्थिक सुरक्षा और सम्मान देने के बड़े दावे के साथ शुरू की गई मुख्यमंत्री माझी लाडकी बहिन योजना अब गंभीर विवादों के केंद्र में है। जुलाई 2024 में जब यह योजना लॉन्च हुई थी, तब इसे महिलाओं की आर्थिक आज़ादी और ‘लखपती दीदी’ बनाने के सपनों से जोड़कर एक बड़े क्रांतिकारी कदम के रूप में पेश किया गया था। राजनीतिक मंचों पर नेताओं ने इसे महिला सम्मान और आत्मनिर्भरता का त्योहार बताया, और चुनावी रैलियों में “लखपती दीदी” का नारा एक जादुई मंत्र की तरह गूंजता था। लेकिन एक साल के भीतर ही यह योजना न केवल वित्तीय अव्यवस्था में डूब गई, बल्कि सरकार की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े कर गई। RTI में सामने आया कि राज्य की कोषागार से 163 करोड़ रुपये उन लोगों को दे दिए गए, जो पात्र ही नहीं थे—यहां तक कि लगभग 12,000 पुरुषों को भी मासिक भत्ता दे दिया गया।
यह खुलासा ऐसे समय आया है जब सरकार खुद वित्तीय दबाव में है और इस योजना को अपना प्रमुख चुनावी हथियार बताती रही है। लेकिन अब वही योजना प्रशासनिक लापरवाही, जल्दबाज़ी और कुप्रबंधन का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई है। जो योजना महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए शुरू की गई थी, उसे अब एक ऐसी कहानी के तौर पर देखा जा रहा है, जिसमें अवसर से ज्यादा नुकसान, और लाभ से ज्यादा भ्रम पैदा हुआ। राज्य भर में 26.34 लाख महिलाएँ ऐसी पाई गईं जो पात्रता के दायरे में ही नहीं आती थीं, फिर भी महीनों तक राशि लेती रहीं—और असली लाभार्थियों की भीड़ अब सत्यापन में अटक गई है।
इन्हीं असली लाभार्थियों में से एक हैं छत्रपति संभाजीनगर की 43 वर्षीय सुनीता (परिवर्तित नाम), जो स्वयं ASHA वर्कर हैं। अपने तंग एक कमरे के घर में वे हर रोज़ बारिश टपकती छत के नीचे लड़खड़ाते सपनों को सहलाती हैं। उनकी जनधन पासबुक में दर्ज 1500 रुपये की मासिक एंट्रियाँ कभी उनके जीवन में आशा की किरण थीं। लेकिन बैंक से उन्हें अचानक बताया गया, “आपका खाता वेरिफिकेशन में है।” कोई स्पष्ट कारण नहीं, कोई जवाब नहीं। मोहल्ले में अफवाह चली कि उनके परिवार में दो से अधिक महिलाएँ हैं, इसलिए उन्हें योजना से बाहर कर दिया गया। यह विडंबना ही है कि सुनीता जैसी ASHA और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने ही इस योजना की जमीनी सत्यापन प्रक्रिया संभाली—लेकिन उन्हीं को योजना से बाहर धकेल दिया गया। जिन महिलाओं ने योजना को ज़मीन पर पहुंचाया, वे स्वयं इसके लाभ से वंचित हैं।
छत्रपति संभाजीनगर जिले में 1.04 लाख आवेदनों का भौतिक सत्यापन हुआ, जिनमें से 84,000 को ‘दो महिलाओं से अधिक’ की मनमानी शर्त पर और 20,000 को उम्र सीमा से बाहर होने पर खारिज कर दिया गया। यह कहानी पूरे राज्य की है, जहाँ अस्वीकृत फार्म बरसाती कागज़ की तरह हर जिला कार्यालय में ढेरों में भरे पड़े हैं। ASHA वर्करों को Independence Day से पहले योजना को ‘सफल’ दिखाने के लिए तेज़ी से काम करने का दबाव बनाया गया। और जब हकदार महिलाओं ने सवाल पूछे, तो उन्हें “डॉक्यूमेंट में नाम की गलती” या “खाते में लिंक नहीं” जैसे कारणों से टाला गया।
योजना की राजनीति भी कोई रहस्य नहीं। इसे चुनावों से ठीक पहले लॉन्च किया गया और बड़े सियासी लाभ की उम्मीद के साथ महिलाओं की बड़ी भीड़ को रैलियों में लाया गया। लेकिन अब, जहाँ असली जवाबदेही की मांग होनी चाहिए, वहाँ महिलाएँ दफ्तरों के चक्कर काटती नज़र आ रही हैं जबकि पोस्टरों पर ‘महिला सशक्तिकरण’ के नारे अब भी गूंज रहे हैं। एक अन्य रिपोर्ट में सामने आया कि पिछले पांच महीनों में एक भी नया आवेदन जमा नहीं हुआ—या तो जनता हतोत्साहित हो गई या सरकार ने चुपचाप आवेदन बंद कर दिए।
महिला एवं बाल विकास मंत्री अदिति तटकरे ने आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया कि 26.3 लाख अपात्र महिलाओं को भुगतान हुआ है। साथ ही, 2,289 से लेकर 2,652 तक महिला सरकारी कर्मचारियों को भी गलत तरीके से लाभ मिलता पाया गया, जिनसे अब रिकवरी की तैयारी चल रही है। कई मामलों में देखा गया कि परिवारों में दो से अधिक महिलाओं ने एक साथ लाभ ले रखा था, और कुछ में पुरुषों ने भी आवेदन कर रकम ले ली। आयकर रिटर्न की क्रॉस-वेरिफिकेशन को अब अनिवार्य कर दिया गया है, और जिला स्तर पर जांच टीमों को सख्त निर्देश दिए गए हैं।
इस बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने इसे “जुमला मॉडल” बताकर तीखा हमला बोला और आरोप लगाया कि चुनाव बीतते ही सरकार ने 8 लाख महिलाओं की मदद राशि 1500 रुपये से घटाकर 500 रुपये कर दी है। दूसरी ओर, शिवसेना और गठबंधन दलों के विधायक भी निजी तौर पर स्वीकार कर रहे हैं कि इस योजना ने उनके क्षेत्रों के विकास फंड को बुरी तरह प्रभावित किया है। स्वास्थ्य मंत्री प्रकाश अबिटकर ने साफ कहा कि अन्य विभागों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ रहा है। उल्लेखनीय है कि सामाजिक कल्याण मंत्री संजय शिर्साट ने तो यहाँ तक कह दिया कि अगर सरकार लगातार सामाजिक विभाग से फंड काटती रहेगी, तो “इसे बंद ही कर देना चाहिए।”
महाराष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व—CM देवेंद्र फडणवीस, CM एकनाथ शिंदे और डिप्टी CM अजित पवार—अब कानूनी कार्रवाई, फर्जी लाभार्थियों से रिकवरी और योजना के पुनर्गठन पर विचार कर रहे हैं। लेकिन राजनीतिक रूप से योजना को तुरंत खत्म करना संभव नहीं, क्योंकि स्थानीय निकाय चुनाव निकट हैं और महिलाएँ इस सरकार का बड़ा वोटबैंक मानी जाती हैं। इसलिए सरकार अब इसे “सुधार कर जारी रखने” की रणनीति पर चल रही है।
आख़िरकार, माझी लाडकी बहिन योजना महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता का वादा करके शुरू हुई थी, लेकिन आज यह प्रशासनिक अव्यवस्था, अपात्र लाभ, गलत भुगतान, और असली लाभार्थियों की उपेक्षा का प्रतीक बन चुकी है। 163 करोड़ रुपये का नुकसान सिर्फ एक आंकड़ा नहीं—बल्कि एक ऐसी व्यवस्था का आईना है जो महिलाओं को ‘लखपती दीदी’ कहकर पुकारती तो है, लेकिन जमीन पर उन्हें सिर्फ उम्मीद, भ्रम और निराशा ही सौंपती है।





