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नाच न आए अंगना टेढ़ा : पहचान पत्र को लेकर गोलपोस्ट बदलती सरकार

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समी अहमद । 28 नवंबर 2025

आधार का महा-भ्रम: नागरिक से हर जगह काग़ज़ माँगने वाली सरकार खुद एक भी भरोसेमंद दस्तावेज़ नहीं दे पाई

भारत की पहचान प्रणाली आज ऐसी व्यवस्था बन चुकी है जहाँ राज्य अपने हाथ से बनाए हुए दस्तावेज़ों पर ही भरोसा नहीं करता, लेकिन नागरिकों को उन्हीं दस्तावेज़ों के बल पर बार-बार कटघरे में खड़ा किया जाता है। यह दृश्य कुछ वैसा ही है जैसे नाचने वाला खुद ताल न पकड़ पाए तो अंगना को टेढ़ा बताने लगे। सरकार ने एक दशक तक आधार कार्ड को ऐसे परोसा जैसे यह नागरिकता, जन्म, पता, अस्तित्व—सब कुछ का मूल प्रमाण हो। लोगों ने भी यही समझा, क्योंकि हर सरकारी दफ्तर, हर बैंक, हर सब्सिडी, हर वेरिफिकेशन में यही कहा गया—“आधार दो।” लेकिन जब कानूनी सच्चाई सामने आई तो सरकार ने पैंतरा बदल लिया: “आधार जन्म प्रमाण नहीं है, नागरिकता प्रमाण नहीं है, यह तो सिर्फ एक संख्या है।” ऐसे में सवाल उठता है—जब यह सिर्फ ‘संख्या’ थी तो इसे जीवन-मरण का दस्तावेज़ दिखाकर जनता को क्यों बाँधा गया?

उत्तर प्रदेश की सरकार ने आधार को जन्म तिथि प्रमाण न मानने का जो आदेश जारी किया है, वह इस पूरे भ्रमजाल का ताजा और सबसे करारा सबूत है। जिस दस्तावेज़ को प्रधानमंत्री से लेकर ग्राम प्रधान तक हर जगह अनिवार्य बनाया गया, जिस पर कल तक करोड़ों प्रक्रियाएँ आधारित थीं, अचानक वह अविश्वसनीय कैसे हो गया? और यह भी पहली बार नहीं है—केंद्र सरकार, UIDAI और सुप्रीम कोर्ट पहले ही कह चुके हैं कि आधार न नागरिकता का प्रमाण है, न जन्म का। तब फिर जनता को किसके सहारे अपनी पहचान सिद्ध करनी है? क्या सरकार यह स्वीकार करने को तैयार है कि उसने 140 करोड़ लोगों को एक ऐसा काग़ज़ पकड़ाया, जिसकी अपनी कोई कानूनी रीढ़ ही नहीं?

समस्या केवल आधार की नहीं—समस्या यह है कि भारत में नागरिकता सिद्ध करने का बोझ नागरिक पर डाल दिया गया है, जबकि राज्य अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी—सटीक, प्रमाणिक और पूर्ण दस्तावेज़ प्रणाली—पूरी करने में विफल रहा है। देश में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। उनके माता-पिता का जन्म घरों में हुआ, दाइयों ने डिलीवरी कराई, किसी ने रजिस्ट्रेशन नहीं कराया। आज वही पीढ़ियाँ सरकारी दफ्तरों में खड़ी हैं, जहाँ उनसे पूछा जाता है—“जन्म प्रमाण पत्र कहाँ है?” वे किससे कहें कि उनके जीवन का कोई काग़ज़ कभी बना ही नहीं? लेकिन सरकार कहती है—“हम क्या करें? नियम तो नियम हैं।” यह नियम नहीं—यह दस्तावेज़ी उत्पीड़न है।

और विडंबना यह कि सरकार हर दस्तावेज़ को एक झटके में अपूर्ण बता देती है। आधार चलेगा नहीं। वोटर कार्ड पर्याप्त नहीं। राशन कार्ड तो वैसे भी अविश्वसनीय। ड्राइविंग लाइसेंस पहचान के लिए मान्य नहीं। पैन कार्ड नागरिकता सिद्ध नहीं करता। पासपोर्ट भी कई बार सवालों के घेरे में।
तो फिर नागरिक आखिर कौन सा काग़ज़ प्रस्तुत करे? कौन सा दस्तावेज़ ऐसा है जो सर्वमान्य हो, सर्वस्वीकृत हो?
जवाब स्पष्ट है—कोई नहीं।

लेकिन नागरिक की परेशानी यहाँ खत्म नहीं होती। जब NRC और CAA जैसे कानूनों की बात आती है, वही सरकार कहती है—“काग़ज़ दिखाओ।”
नागरिक पूछता है—“कौन सा?”
सरकार कहती है—“जो तुम्हारे पास हो।”
नागरिक दिखाता है—सरकार कहती है—“यह मान्य नहीं।”

यह प्रशासन नहीं, यह भ्रमजाल है—और इस भ्रमजाल के केंद्र में खड़ा आदमी वह गरीब नागरिक है जिसे कभी अपनी नागरिकता सिद्ध करने की जरूरत नहीं थी, लेकिन अब हर मोड़ पर प्रमाण साबित करना पड़ता है।

सरकार ने आधार को हर योजना का ‘दरवाज़ा’ बना दिया, लेकिन कानूनी मान्यता का ताला लगा दिया। यह ऐसा है जैसे किसी को घर में घुसने के लिए चाबी दी जाए, लेकिन बताया जाए कि वह सिर्फ कार खोलने के काम आएगी। यह विरोधाभास नहीं, यह प्रशासनिक पाखंड है। जनता को बहकाया गया, गुमराह किया गया, और अब जब कानूनी चुनौतियाँ सामने आ रही हैं, सरकार पीछे हट रही है।

यह देश एक ऐसी पहचान प्रणाली की मांग करता है जिसमें जन्म, निवास, पहचान और नागरिकता—सबका एकीकृत, कानूनी और सार्वभौमिक रिकॉर्ड हो। जन्म पंजीकरण को सरल बनाना होगा। गरीबों, प्रवासियों, मुसाफिर समुदायों और पिछड़े वर्गों के लिए दस्तावेज़ी सहायता प्रणाली बनानी होगी। डिजिटल पहचान को कानूनी स्तर पर स्पष्ट परिभाषित करना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण—राज्य को यह स्वीकारना होगा कि नागरिकता नागरिक की नहीं, राज्य की जिम्मेदारी है।

जब तक भारत अपने दस्तावेज़ी ढांचे को मूल से नहीं सुधारता, तब तक यह देश उसी अविश्वसनीय प्रणाली में फँसा रहेगा जहाँ नागरिक को हर समय साबित करना पड़ता है कि वह वही है जो वह हमेशा से था। और राज्य?
राज्य अंगना को दोष देता रहेगा—क्योंकि उसे नाचना नहीं आता।

मतलब बेहद साफ़ है— सरकार जब तक नागरिकों को एक भरोसेमंद, तयशुदा और कानूनी दस्तावेज़ नहीं देती, तब तक उसे नागरिकों से कोई काग़ज़ मांगने का नैतिक अधिकार नहीं है। नागरिकता कोई प्रतियोगिता नहीं — यह संविधान द्वारा दिया गया जन्मसिद्ध अधिकार है। इसे साबित करना नागरिक का बोझ नहीं, राज्य का कर्तव्य है।

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