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“दस हज़ार का धोखा”: महाराष्ट्र से दिल्ली होते हुए अब बिहार तक—महिलाओं के वादों को ‘जुमला’ बनाने का बीजेपी का सिलसिला फूटा सड़कों पर

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सरोज सिंह । 29 नवंबर 2025

बिहार की ग्रामीण गलियों में आज वही तस्वीर दिख रही है, जो महाराष्ट्र और दिल्ली में पहले ही उभर चुकी थी—निराश, ठगा हुआ, और गुस्से से भरा महिला समुदाय। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में शुरू की गई ‘मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना’ के तहत 10,000 रुपये की एकमुश्त सहायता का वादा किया गया था, ताकि महिलाएँ छोटे व्यवसाय शुरू कर सकें। लेकिन महीनों बीत गए, कागज़ात जमा हुए, अफसरों ने चक्कर कटवाए, और वादों की लंबी सूची एक बार फिर ठंडे बस्ते में जा चुकी है। अधिकारी इसे “फार्म की गलती”, “प्रोसेसिंग में देरी” और “तकनीकी समस्या” बताकर बच निकलने की कोशिश करते हैं, लेकिन सच यह है कि इन वादों में न पैसा था, न राजनीतिक ईमानदारी—सिर्फ चुनावी लालच का एक और ‘इंस्टॉलमेंट’।

बीजेपी का यह पैटर्न अब किसी राजनीतिक विश्लेषण का विषय नहीं, बल्कि एक क्रूर, दोहराया जाने वाला चक्र है। महाराष्ट्र में 1,500 रुपये प्रतिमाह का वादा किया गया—न मिला। दिल्ली में 2,500 रुपये प्रतिमाह का बड़ा ऐलान हुआ—आज भी महिलाएँ इंतजार कर रही हैं। और अब बिहार—जहाँ 10,000 से लेकर 2 लाख तक की आर्थिक सहायता की घोषणा चुनावी पोस्टरों में भले ही शानदार दिखी हो, मगर हकीकत में वह एक और अधूरा वादा साबित हुई। महिलाएँ अब सड़क पर हैं, बैनर लेकर, आवाज़ उठाकर, उस पैसे का हिसाब मांगते हुए जो सरकार ने चुनाव जीतने के लिए बाँटने का दावा किया था, लेकिन देने का कभी इरादा नहीं था।

मोदी सरकार की विश्वसनीयता पर सवाल तो तब ही खड़े हो गए थे जब 2014 में अमित शाह स्वयं टीवी पर आकर 15 लाख रुपये के वादे को मुस्कुराते हुए “जुमला” बता गए थे। उस दिन देश ने सोचा था कि यह एक गलती थी। अब, बारह साल बाद, वही ‘जुमला संस्कृति’ महिलाओं की योजनाओं तक पहुँच चुकी है। महाराष्ट्र से दिल्ली और अब बिहार—हर राज्य में बीजेपी ने महिलाओं के सपनों को चुनावी EMI की तरह इस्तेमाल किया—वादों की किस्तें दीं, लेकिन कभी兑现 नहीं कीं।

इसी राजनीतिक ठगी के खिलाफ अखिलेश यादव ने भी तीखा हमला किया है। उनका बयान— “मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं”—आज बिहार की हर गली में लोग गा रहे हैं। यादव ने साफ कहा कि अब जनता बीजेपी के नेताओं से घर-घर जाकर पूछेगी कि वह 10,000 रुपये कहाँ गए। उनके शब्दों में—“पैसों की बात करके मुकर जाने वाले बीजेपी वाले दसों साल से यही कर रहे हैं… अब महिलाएँ दस हजार का हिसाब माँगेंगी, और बीजेपी भागती फिरेंगी।” यह सिर्फ राजनीतिक बयान नहीं—यह सरकार की उस आदत पर सटीक वार है जिसमें वह घोषणाएँ तो कर देती है, लेकिन ज़मीन पर सिर्फ चुप्पी और इंतज़ार छोड़ती है।

बीजेपी जिस “पैसा बाँटने” की रणनीति को अपना मास्टरस्ट्रोक बताकर प्रचार करती थी, वही अब उसके लिए भारी पड़ता जा रहा है। जनता अब अंधी नहीं है, न भोली। वह हर वादा याद रखती है। वह हर जुमले की स्याही से हिसाब लिख रही है। बेशक बीजेपी ने योजनाओं की घोषणा को चुनावी हथियार समझा, लेकिन जनता अब उसी हथियार को वापस घुमाने के मूड में है। विपक्ष इसे “जुगाड़ी जीत का खेल” कह रहा है, पर जनता इसे धोखे की राजनीति के रूप में समझ चुकी है।

आज स्थिति यह है कि जैसे ही लोग किसी बीजेपी कार्यकर्ता को देखते हैं, गली-मोहल्ले में एक ही आवाज़ उठ रही है—

“बीजेपी पर है उधार—दस हज़ार, दस हज़ार!”

जो वादा महिलाएँ अपने अधिकार समझकर घर में लेकर बैठी थीं, वह अब उनके गुस्से का स्तंभ बन चुका है। बिहार की महिलाएँ सिर्फ 10,000 रुपये नहीं मांग रहीं—वे सरकार से उसकी खोई हुई विश्वसनीयता का हिसाब मांग रही हैं। और अगर यह आक्रोश इसी तरह बढ़ता रहा, तो वह दिन दूर नहीं जब यह 10,000 रुपये का सवाल बीजेपी के पूरे राजनीतिक किले को हिला देगा।

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