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कुलदीप सेंगर की जमानत को सुप्रीम अदालत में चुनौती — दो महिला वकील बोलीं: यह न्याय की धज्जियाँ उड़ाने जैसा

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सुमन कुमार | नई दिल्ली, 25 दिसंबर

उन्नाव रेप मामले में दोषी करार दिए जा चुके पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा दी गई राहत और उसकी उम्रकैद की सजा निलंबित कर जमानत दिए जाने के फैसले ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस आदेश के खिलाफ अब न्याय की लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई है। दो महिला वकीलों — अंजलि पटेल और पूजा शिल्पकार — ने शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले को सीधी चुनौती दी है।

याचिका में इन वकीलों ने बेहद कड़े शब्दों में कहा है कि यह आदेश सिर्फ एक व्यक्ति को राहत नहीं, बल्कि गंभीर अपराधों के दोषियों के लिए खतरनाक मिसाल है। उनका कहना है कि ऐसा लगता है मानो न्याय व्यवस्था के दरवाज़े ताक़तवर अपराधियों के लिए खोल दिए गए हों और पीड़िताओं के हिस्से में सिर्फ डर और असुरक्षा बची हो।

महिला वकीलों का तर्क है कि दिल्ली हाई कोर्ट ने अपराध की भयावहता, पीड़िता पर पड़े दीर्घकालिक मानसिक और सामाजिक प्रभाव तथा समाज को जाने वाले गलत संदेश को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उनका कहना है कि उम्रकैद जैसी सज़ा को निलंबित करना न्याय के उस सिद्धांत को कमजोर करता है, जो कहता है कि कानून पीड़ित के साथ खड़ा होता है, न कि अपराधी के साथ।

गौरतलब है कि 2017 के उन्नाव रेप मामले में सेंगर को दोषी ठहराते हुए अदालत ने उम्रकैद की सज़ा सुनाई थी। यह वही मामला है जिसने पूरे देश में सत्ता, पुलिस और न्याय व्यवस्था की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। ऐसे में हाई कोर्ट का यह फैसला पीड़िता ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए एक गहरे विश्वासघात की तरह देखा जा रहा है।

पीड़िता की प्रतिक्रिया भी बेहद भावुक और दर्दनाक रही है। उसने इस आदेश को अपने लिए “काल” और “जीवन के लिए सीधा खतरा” बताया है। पीड़िता का कहना है कि ऐसे फैसले महिलाओं के खिलाफ अपराध करने वालों का हौसला बढ़ाते हैं और यह संदेश देते हैं कि अगर आप ताक़तवर हैं, तो सज़ा भी अस्थायी हो सकती है।

इस फैसले के बाद सियासी माहौल भी गरमा गया है। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत कई विपक्षी दलों ने हाई कोर्ट के आदेश पर तीखा हमला बोला है और कहा है कि न्याय को राजनीति और प्रभावशाली लोगों की पकड़ से आज़ाद करना होगा। वहीं, सत्तापक्ष से जुड़े कुछ नेताओं ने इसे “कानूनी प्रक्रिया” बताकर बचाव करने की कोशिश की है, जिसने बहस को और तेज कर दिया है।

अब पूरे देश की निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। यह मामला सिर्फ सेंगर की जमानत का नहीं है, बल्कि यह तय करेगा कि क्या भारत की न्याय व्यवस्था पीड़िताओं के डर को समझती है या अपराधियों की सहूलियत को प्राथमिकता देती है। यह लड़ाई न्याय की आत्मा, महिलाओं की सुरक्षा और समाज के सबसे कमजोर वर्गों के विश्वास की है।

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