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आरक्षण, राजनीति और सामाजिक न्याय के बीच महाराष्ट्र का फैसला — क्या मुसलमानों को हाशिए पर पहुंचाने की एक और कोशिश?

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एबीसी नेशनल न्यूज | मुंबई | 20 फरवरी 2026

महाराष्ट्र में 5 प्रतिशत मुस्लिम आरक्षण से जुड़े प्रशासनिक ढांचे को समाप्त करने का निर्णय केवल एक सरकारी आदेश नहीं, बल्कि एक ऐसी बहस को फिर से केंद्र में ले आया है जिसमें संविधान, सामाजिक न्याय, अल्पसंख्यक अधिकार और राजनीतिक रणनीति एक साथ टकराते दिखाई देते हैं। यह मुद्दा इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि आरक्षण केवल शिक्षा और रोजगार की सीटों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह प्रतिनिधित्व, भरोसे और बराबरी के अवसर का प्रतीक भी बन जाता है।

सरकार का तर्क है कि मुस्लिम आरक्षण लंबे समय से कानूनी चुनौतियों और न्यायिक टिप्पणियों के कारण प्रभावी नहीं रह गया था। ऐसे में प्रशासनिक स्पष्टता के लिए इस ढांचे को समाप्त करना एक व्यावहारिक कदम माना जा रहा है। शासन के दृष्टिकोण से देखें तो ऐसी व्यवस्था, जो कानूनी रूप से टिकाऊ न हो और केवल कागजी रूप में मौजूद रहे, न तो लाभार्थियों को वास्तविक फायदा दे पाती है और न ही प्रशासनिक व्यवस्था को स्पष्ट दिशा प्रदान करती है।

इसके बावजूद विपक्ष और सामाजिक संगठनों की चिंताओं को नजरअंदाज करना भी आसान नहीं है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में अल्पसंख्यक समुदायों का शैक्षणिक और आर्थिक पिछड़ापन एक स्थापित वास्तविकता है। मुस्लिम समाज के भीतर मौजूद सामाजिक-आर्थिक विषमता पर कई आयोगों और रिपोर्टों ने पहले ही ध्यान आकर्षित किया है। ऐसे में किसी विशेष व्यवस्था के समाप्त होने से समुदाय के भीतर अवसरों, प्रतिनिधित्व और भविष्य को लेकर असुरक्षा की भावना पैदा होना स्वाभाविक है, भले ही वह व्यवस्था व्यवहार में सीमित प्रभाव वाली क्यों न रही हो।

दरअसल असली सवाल यह नहीं है कि आरक्षण रहे या न रहे, बल्कि यह है कि समान अवसरों की गारंटी कैसे सुनिश्चित की जाए। यदि आरक्षण न्यायिक कसौटी पर टिक नहीं पा रहा था, तो उसके स्थान पर लक्षित छात्रवृत्तियां, शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने वाले कार्यक्रम, कौशल विकास, उद्यमिता प्रोत्साहन और पिछड़े क्षेत्रों में केंद्रित विकास योजनाएं अधिक प्रभावी विकल्प बन सकती हैं। सामाजिक न्याय की सफलता नीति की घोषणा से नहीं, बल्कि उसके जमीन पर दिखने वाले परिणामों से तय होती है।

राजनीतिक दृष्टि से यह मुद्दा ध्रुवीकरण की संभावनाओं से भरा हुआ है। सत्ता पक्ष इसे कानूनी स्पष्टता और समान नीति के रूप में प्रस्तुत करेगा, जबकि विपक्ष इसे अल्पसंख्यक अधिकार और सामाजिक न्याय के सवाल से जोड़कर देखेगा। ऐसे माहौल में खतरा यह रहता है कि वास्तविक विकास, शिक्षा और रोजगार के ठोस मुद्दे राजनीतिक बयानबाजी के शोर में पीछे छूट जाएं।

लोकतंत्र में नीतियों की सबसे बड़ी कसौटी यह होती है कि वे समाज में विश्वास पैदा करें, भय नहीं। सरकार के सामने चुनौती यह है कि वह यह भरोसा दिलाए कि आरक्षण का ढांचा समाप्त होने का अर्थ अवसरों का समाप्त होना नहीं है। वहीं विपक्ष और सामाजिक संगठनों की जिम्मेदारी है कि वे इस बहस को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक समाधान और रचनात्मक सुझाव सामने रखें।

महाराष्ट्र का यह फैसला एक चेतावनी और अवसर दोनों के रूप में देखा जा सकता है—चेतावनी इसलिए कि सामाजिक न्याय के मुद्दे अत्यंत संवेदनशील होते हैं, और अवसर इसलिए कि अब ऐसी नीतियों पर पुनर्विचार किया जा सकता है जो कानूनी रूप से मजबूत, सामाजिक रूप से न्यायपूर्ण और राजनीतिक रूप से समावेशी हों। सामाजिक न्याय की असली परीक्षा यही है कि समाज का कोई भी आदमी विकास की मुख्यधारा से बाहर महसूस न करे और हर नागरिक को आगे बढ़ने के लिए बराबरी का अवसर मिले।

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