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युवा: देश का भविष्य, लेकिन बेरोज़गारी दरें क्या कहती हैं?

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नई दिल्ली 2 सितंबर 2025

उम्मीदों का भारत और युवाओं की भूमिका

भारत को दुनिया का सबसे युवा देश कहा जाता है। यहाँ की 65% आबादी 35 साल से कम उम्र की है। यह आँकड़ा सुनते ही हमारे सामने एक शक्तिशाली भारत की तस्वीर उभरती है—जहाँ युवा अपने ज्ञान, कौशल और मेहनत से दुनिया में सबसे आगे ले जाने की क्षमता रखते हैं। युवाओं को अक्सर “देश का भविष्य” कहा जाता है, क्योंकि उनकी सोच, उनकी ऊर्जा और उनके सपने ही कल के भारत की दिशा तय करेंगे। लेकिन सवाल यह है कि जब इन युवाओं को रोज़गार नहीं मिल रहा, तो भविष्य कैसा होगा?

बेरोज़गारी के ताज़ा आँकड़े

हाल ही में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (CMIE) और सरकारी सर्वे (PLFS) के ताज़ा आँकड़ों के मुताबिक, जुलाई 2025 में भारत की कुल बेरोज़गारी दर 5.2% रही। यह दर जून में 5.6% थी, यानी थोड़ी कमी दर्ज हुई है। ग्रामीण इलाक़ों में बेरोज़गारी 4.4% के आसपास रही जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 7% से ऊपर बनी हुई है। लेकिन असली चिंता की बात तब सामने आती है जब हम युवा बेरोज़गारी दर देखते हैं। जून 2025 में शहरी युवाओं (15–29 वर्ष) की बेरोज़गारी दर 18.8% और ग्रामीण युवाओं की 13.8% रही। जुलाई में इसमें मामूली गिरावट आई और यह लगभग 14.9% पर आ गई। यानी देश का हर छठा युवा बेरोज़गार है। यह आंकड़े चीख-चीख कर बताते हैं कि हमारा भविष्य संकट में है।

शिक्षित युवाओं की बढ़ती निराशा

यह समस्या सिर्फ़ अनपढ़ या कम पढ़े-लिखे युवाओं की नहीं है। असल में, आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा प्राप्त बेरोज़गारों की संख्या तेजी से बढ़ी है। साल 2012 में जहाँ 35% बेरोज़गार स्नातक या उससे ऊपर की डिग्री रखते थे, वहीं 2022 तक यह संख्या बढ़कर 65% से अधिक हो गई। यानी जितना पढ़ाई में निवेश किया जा रहा है, उतना ही निराशाजनक परिणाम नौकरी बाज़ार में मिल रहा है। हर साल लाखों इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और प्रोफेशनल डिग्रियां लेने वाले युवा निकलते हैं, लेकिन उनके सामने अवसर बहुत सीमित रह जाते हैं।

युवाओं पर मानसिक और सामाजिक दबाव

जब किसी युवा को नौकरी नहीं मिलती तो यह केवल उसकी व्यक्तिगत परेशानी नहीं होती, बल्कि पूरे परिवार और समाज पर असर डालती है। लंबे समय तक बेरोज़गारी से निराशा, तनाव, अवसाद और आत्महत्या जैसी स्थितियाँ पैदा होती हैं। रिपोर्ट्स में बार-बार सामने आया है कि बेरोज़गारी अपराध, नशाखोरी और सामाजिक असुरक्षा को भी बढ़ावा देती है। ऐसे में युवाओं की ऊर्जा जो देश निर्माण में लगनी चाहिए थी, वह गलत दिशा में जाने का खतरा बढ़ जाता है।

सरकार और समाज की जिम्मेदारी

सरकार ने कई योजनाएँ शुरू की हैं—स्टार्टअप इंडिया, मेक इन इंडिया, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना, युवाओं के लिए इंटर्नशिप स्कीम और राज्यों की अपनी रोजगार योजनाएँ। उदाहरण के लिए, कर्नाटक की “युवा निधि योजना” के तहत बेरोज़गार स्नातकों को ₹3,000 और डिप्लोमा धारियों को ₹1,500 की मासिक सहायता दी जा रही है। लेकिन हकीकत यह है कि इन योजनाओं का दायरा सीमित है और लाखों युवाओं तक नहीं पहुँच पाता। निजी क्षेत्र और समाज की भी जिम्मेदारी है कि वे युवाओं को केवल नौकरी खोजने वाला न मानें, बल्कि उद्यमिता और स्वरोज़गार की दिशा में प्रोत्साहित करें।

भारत के युवा सच में देश का भविष्य हैं, लेकिन मौजूदा बेरोज़गारी दरें हमें यह सोचने पर मजबूर करती हैं कि कहीं यह भविष्य अधूरा तो नहीं रह जाएगा। अगर हर छठा युवा बेरोज़गार है तो इसका सीधा मतलब है कि हमारी नीतियों और व्यवस्था में खामियाँ हैं। देश की सबसे बड़ी पूँजी—युवाओं—को अगर सही दिशा और अवसर नहीं मिला तो यह अवसर एक बोझ बन सकता है। ज़रूरी है कि आज हम बेरोज़गारी की चुनौती का सामना करें और युवाओं के लिए ऐसे रास्ते बनाएं जिनसे वे न सिर्फ़ नौकरी पाने वाले बनें बल्कि खुद भी रोज़गार देने वाले बन सकें। तभी भारत वास्तव में अपनी युवा ताक़त से विश्व का नेतृत्व कर पाएगा।

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