एबीसी डेस्क 16 दिसंबर 2025
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के नाम पर मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम काटे जाने का मुद्दा अब सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति का विस्फोटक केंद्र बनता जा रहा है। सवाल सीधा है—जिन नामों को काटा गया, क्या वे विदेशी हैं? क्या उन्हें देश से बाहर भेजा जाएगा? या फिर यह एक सुनियोजित राजनीतिक छंटनी है, जिसका मकसद चुनावी गणित को साधना है? इस बहस में अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बयान ऐसी चिंगारी बन गया है, जिसने दिल्ली तक सियासी ताप बढ़ा दिया है।
तथ्यों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में SIR के तहत लगभग 4 करोड़ मतदाताओं के नाम कटने की बात सामने आई है। यह संख्या अपने आप में अभूतपूर्व है। इससे भी ज्यादा सनसनीखेज दावा यह है कि इनमें से करीब 85 प्रतिशत मतदाता “अपने” बताए जा रहे हैं—यानी वे किसी विपक्षी खेमे के नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ धड़े के परंपरागत वोटर माने जाते हैं। योगी आदित्यनाथ के इस कथन ने पूरे विमर्श को पलट दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि अगर कटे नाम “अपने” हैं, तो SIR का असली निशाना कौन था? और अगर निशाना विरोधी वोट थे, तो फिर अपने वोट कैसे कट गए?
राजनीतिक विश्लेषक इसे अमित शाह–मोदी की SIR रणनीति और योगी आदित्यनाथ की उत्तराधिकार-राजनीति के टकराव के रूप में देख रहे हैं। कहा जा रहा है कि केंद्र में सत्ता को और मजबूत करने की जिस तरकीब के तौर पर SIR को आगे बढ़ाया गया, उसी की “पूंछ” में योगी के बयान ने आग लगा दी है। योगी का यह सार्वजनिक दावा केवल प्रशासनिक असहजता नहीं, बल्कि यह संकेत देता है कि वे इस “बड़े खेल” को समझ चुके हैं—और समय रहते चेतावनी दे रहे हैं कि अगर इसे रोका नहीं गया, तो सत्ता-संतुलन अमित शाह के पक्ष में स्थायी हो सकता है।
राजनीति में सीधे वार कम ही होते हैं; यहां संकेतों और कारणों के साथ परतें खोली जाती हैं। योगी ने भी यही किया। उन्होंने चुनाव आयोग या केंद्र पर सीधा आरोप नहीं लगाया, लेकिन “4 करोड़ में 85 प्रतिशत अपने” कहकर पूरी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा कर दिया। इससे SIR की मूल भावना—मतदाता सूची की शुद्धता—पर संदेह गहराया है। यदि बड़े पैमाने पर नाम काटे गए, तो उनकी वैधानिक जांच, अपील और पुनर्स्थापन की पारदर्शी प्रक्रिया कहां है? क्या यह प्रक्रिया समान रूप से लागू हुई, या राजनीतिक झुकाव के आधार पर?
विपक्ष का आरोप पहले से रहा है कि SIR का इस्तेमाल विरोधी वोटों को व्यवस्थित ढंग से बाहर करने के लिए किया जा रहा है—यानी एक तरह की “वोट चोरी”। योगी का बयान इस आरोप को अप्रत्याशित समर्थन देता दिख रहा है, क्योंकि अगर अपने वोट भी कट रहे हैं, तो या तो प्रक्रिया गंभीर रूप से दोषपूर्ण है, या फिर लक्ष्य इतना व्यापक था कि नियंत्रण से बाहर चला गया। दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं।
अब सवाल यह भी है कि मोदी–शाह इस आग को बुझाएंगे या इसे सुलगने देंगे। अगर केंद्र ने त्वरित, तथ्यपरक और पारदर्शी स्पष्टीकरण नहीं दिया—जैसे कटे नामों का वर्गीकरण, कारण, अपील की समय-सीमा और बहाली का रोडमैप—तो यह मुद्दा चुनाव आयोग की निष्पक्षता और चुनावी विश्वसनीयता तक पहुंच सकता है। योगी द्वारा खुले मंच से उठाया गया यह प्रश्न दिल्ली की सत्ता के लिए खुला चैलेंज बन चुका है।
निष्कर्ष साफ है: SIR अब केवल तकनीकी अभ्यास नहीं रहा। यह भारतीय राजनीति के शक्ति-संतुलन, उत्तराधिकार की लड़ाई और लोकतांत्रिक भरोसे की परीक्षा बन गया है। अगर समय रहते तथ्य सामने नहीं रखे गए, तो यह चिंगारी आग बनेगी—और उसका असर सिर्फ एक राज्य या एक चुनाव तक सीमित नहीं रहेगा।




