नई दिल्ली, 28 अक्टूबर 2025
देश में चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता पर लगातार सवाल उठाने वाले समाजसेवी एवं राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने आज एक बार फिर चुनाव आयोग (Election Commission of India) को कठघरे में खड़ा कर दिया है। उन्होंने SIR यानी Systematic Information Reporting योजना को लेकर चुनाव आयोग से 14 गंभीर सवाल पूछे हैं और कहा है कि “अगर बिहार की तरह यह प्रक्रिया पूरे देश में लागू की गई तो करोड़ों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित किया जा सकता है।” यादव ने कहा कि चुनाव आयोग को देश के नागरिकों को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि SIR योजना का उद्देश्य क्या है — पारदर्शिता या पहचान के नाम पर भय और भ्रम का निर्माण।
बिहार से क्या सीखा आयोग ने?
योगेन्द्र यादव ने अपने पहले सवाल में पूछा कि बिहार में SIR प्रक्रिया के दौरान हुए भारी विवाद, त्रुटियों और जन-विरोधी घटनाओं से चुनाव आयोग ने क्या सबक लिया है। बिहार में इस प्रक्रिया के तहत 65 लाख मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे, जबकि नए मतदाताओं को जोड़ने की प्रक्रिया लगभग ठप रही। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि उसने उन गलतियों को सुधारने के लिए कौन-से कदम उठाए हैं। यादव के अनुसार, “अगर आयोग ने उस प्रयोग से कुछ नहीं सीखा, तो यह प्रक्रिया लोकतंत्र के लिए आत्मघाती साबित होगी।”
2002-03 का वर्ष क्यों बना आधार?
योगेन्द्र यादव ने दूसरा सवाल उठाते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने 2002/2003 को ‘कटऑफ वर्ष’ घोषित किया है, जबकि खुद आयोग की ही गाइडलाइंस बताती हैं कि उस समय नागरिकता की कोई जांच या दस्तावेजी सत्यापन नहीं हुआ था। उस वर्ष न तो कोई विशेष एन्यूमरेशन फॉर्म जारी किया गया था, न ही नागरिकता प्रमाण के लिए दस्तावेज़ मांगे गए थे। उन्होंने कहा कि यदि 2002 को आधार बनाया गया है, तो यह गलत और भ्रामक है क्योंकि उस वर्ष कोई नागरिकता-आधारित सत्यापन हुआ ही नहीं था। इस आधार पर भविष्य की मतदाता सूचियों का निर्माण संविधान के अनुच्छेद 326 की भावना के विरुद्ध होगा।
क्या विदेशी नागरिकों की पहचान ही उद्देश्य है?
योगेन्द्र यादव ने तीसरे प्रश्न में पूछा कि क्या चुनाव आयोग अब भी “विदेशी नागरिकों की पहचान” को SIR योजना का उद्देश्य मानता है? उन्होंने याद दिलाया कि SIR की मूल अधिसूचना में इसे एक उद्देश्य बताया गया था, लेकिन बिहार में इस दिशा में कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आया। उन्होंने सवाल किया कि अगर बिहार में विदेशी नागरिकों की संख्या शून्य रही, तो फिर इस प्रक्रिया को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का औचित्य क्या है? यादव के अनुसार, “यह बहाना बनाकर आयोग नागरिकों के मताधिकार पर अप्रत्यक्ष रूप से हमला कर रहा है।”
आधार कार्ड अस्वीकार्य तो अन्य दस्तावेज़ क्यों मान्य?
योगेन्द्र यादव ने चौथे बिंदु में कहा कि आयोग की नीति में गहरा विरोधाभास है। जब आधार कार्ड को नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता, तो फिर नौ अन्य दस्तावेज़ (जैसे बिजली बिल, पानी का बिल, टेलीफोन बिल आदि) को कैसे नागरिकता का प्रमाण माना जा रहा है? उन्होंने कहा कि यह दोहरी नीति SIR की पारदर्शिता पर सवाल उठाती है और गरीब, प्रवासी या दस्तावेज़विहीन नागरिकों के लिए यह प्रक्रिया एक नए भय का कारण बनेगी।
छूट किसे मिलेगी — व्यक्ति को या वंशजों को?
योगेन्द्र यादव ने कहा कि चुनाव आयोग बार-बार यह स्पष्ट करने में विफल रहा है कि जिनका नाम 2002/2003 की मतदाता सूची में था, छूट का लाभ केवल उन्हें मिलेगा या उनके परिवार और वंशजों को भी। बिहार में तो “वंशावली” के आधार पर छूट दी गई, जिससे पूरे परिवारों को लाभ मिला, लेकिन यह नियम आधिकारिक आदेश में दर्ज नहीं था। उन्होंने कहा कि “इस अस्पष्टता ने SIR को एक मनमानी प्रक्रिया में बदल दिया है।”
नए मतदाताओं की उपेक्षा क्यों?
अपने छठे सवाल में यादव ने कहा कि बिहार में ड्राफ्ट रोल प्रकाशित होने से पहले कोई नया मतदाता नहीं जोड़ा गया था, जबकि लाखों नाम हटाए गए। इससे यह संदेह पैदा होता है कि SIR का मकसद जोड़ना नहीं, हटाना था। उन्होंने पूछा कि क्या अब आयोग ने अपने प्रोटोकॉल में बदलाव किया है, ताकि नए युवा मतदाताओं को भी सही तरीके से शामिल किया जा सके? अगर नहीं, तो यह प्रक्रिया संविधान की लोकतांत्रिक भावना के खिलाफ है।
रसीद का अधिकार क्यों छीना गया?
योगेन्द्र यादव ने सातवां सवाल उठाया कि बिहार में जिन लोगों ने अपने दस्तावेज़ जमा किए, उन्हें रसीद नहीं दी गई। जबकि SIR आदेश में स्पष्ट लिखा था कि हर व्यक्ति को दस्तावेज़ जमा करने पर एक “Acknowledgement Slip” दी जाएगी। यादव ने कहा कि “यह पारदर्शिता नहीं, मनमानी का नमूना है,” और आयोग को यह बताना चाहिए कि क्या अब यह गलती सुधारी गई है।
BLO द्वारा फर्जीवाड़े की रिपोर्टें
आठवें सवाल में यादव ने बेहद गंभीर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि बिहार में कई जगहों से रिपोर्ट आई कि बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) ने अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए बिना नागरिक की जानकारी के फॉर्म भर दिए। उन्होंने पूछा कि क्या चुनाव आयोग को ऐसी कोई शिकायत मिली? अगर हां, तो क्या कार्रवाई हुई? यादव ने कहा, “अगर BLO ही फर्जी फॉर्म भरने लगें तो SIR लोकतंत्र नहीं, नौकरशाही की जबरदस्ती बन जाएगी।”
प्रवासी मजदूरों की स्थिति पर चुप क्यों आयोग?
योगेन्द्र यादव ने कहा कि देशभर में करोड़ों प्रवासी मजदूर हैं, जो छह-छह महीने घर से बाहर रहते हैं। SIR जैसी जटिल प्रक्रिया में उनका नाम मतदाता सूची से गायब होना तय है। उन्होंने पूछा कि आयोग ने उनके लिए क्या विशेष व्यवस्था की है? क्या उन्हें कोई वैकल्पिक डिजिटल सुविधा या मोबाइल सत्यापन प्रणाली दी जाएगी?
महिलाओं के मतदाता अनुपात में गिरावट
दसवें बिंदु में यादव ने कहा कि बिहार में SIR प्रक्रिया के बाद महिला मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई, जिसे आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे में स्वीकार भी किया। उन्होंने चेतावनी दी कि “अगर यह रुझान राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया गया, तो यह महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों पर सीधा हमला होगा।”
नाम हटाने वालों को सुनवाई का अधिकार
ग्यारहवें सवाल में यादव ने कहा कि बिहार में 65 लाख मतदाताओं को बिना नोटिस दिए सूची से हटा दिया गया था। उन्होंने पूछा कि क्या अब आयोग ने यह सुनिश्चित किया है कि नाम हटाने से पहले नागरिकों को नोटिस और सुनवाई का अवसर दिया जाएगा? उन्होंने कहा, “मतदाता सूची से नाम हटाना किसी व्यक्ति के संवैधानिक अधिकार को खत्म करने के बराबर है, और यह बिना सुनवाई के नहीं होना चाहिए।”
कई वैध दस्तावेज़ों को क्यों हटाया गया?
बारहवें सवाल में उन्होंने कहा कि SIR प्रक्रिया में PAN कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, राशन कार्ड, MNREGA जॉब कार्ड और बैंक पासबुक को मान्य दस्तावेज़ों की सूची से हटा दिया गया है। उन्होंने कहा कि यह निर्णय गरीब, ग्रामीण और श्रमिक वर्ग के खिलाफ है, जिनके पास अक्सर इन्हीं दस्तावेज़ों के अलावा कुछ नहीं होता।
डुप्लीकेट डेटा और सॉफ्टवेयर का सवाल
तेरहवें प्रश्न में यादव ने पूछा कि क्या आयोग के पास कोई “डीडुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर” है, जिससे फर्जी या दोहरे नामों को हटाया जा सके? उन्होंने कहा कि बिहार की अंतिम मतदाता सूची में लाखों डुप्लीकेट नाम पाए गए थे, और अगर आयोग इस पर तकनीकी नियंत्रण नहीं करेगा, तो SIR केवल एक दिखावा बनकर रह जाएगा।
मतदाता सूची सार्वजनिक क्यों नहीं की जाती?
अपने अंतिम सवाल में यादव ने कहा कि मतदाता सूची सार्वजनिक सूचना है, इसलिए आयोग को ड्राफ्ट और फाइनल रोल्स को मशीन-पठनीय फॉर्मेट में जारी करने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। उन्होंने पूछा कि आखिर आयोग पारदर्शिता से क्यों डर रहा है?
“SIR पारदर्शिता नहीं, भय और भ्रम का औजार है”
योगेन्द्र यादव ने अपने बयान में कहा, “SIR पारदर्शिता की पहल नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों पर शक की छाया है। अगर बिहार का प्रयोग राष्ट्रीय स्तर पर दोहराया गया, तो यह देश में भय और अविश्वास का नया अध्याय लिखेगा। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह इन सवालों के जवाब दे और नागरिकों को आश्वस्त करे कि यह योजना लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है, कमजोर करने के लिए नहीं।”




