एबीसी नेशनल न्यूज | नोएडा | 10 फरवरी 2026
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल चैटिंग या मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा। उत्तर प्रदेश में यमुना एक्सप्रेसवे पर मिली एक अज्ञात, खून से सनी और सड़ी-गली महिला की लाश ने पुलिस को ऐसे मोड़ पर खड़ा कर दिया था, जहां कोई नाम, कोई पहचान और कोई प्रत्यक्ष सुराग नहीं था। शव काले टेप और कंबल में लिपटा हुआ था, चेहरा आंशिक रूप से क्षत-विक्षत था और पहचान असंभव लग रही थी। शुरुआती जांच ठहर सी गई थी—लेकिन फिर तकनीक ने तस्वीर बदल दी।
पुलिस सूत्रों के मुताबिक, शव की हालत इतनी खराब थी कि पारंपरिक तरीकों से पहचान मुश्किल थी। मौके से मिले सीमित साक्ष्यों में एक टैटू अहम कड़ी बना। इसी आधार पर पुलिस ने AI आधारित फेसियल रिकंस्ट्रक्शन तकनीक का सहारा लिया। विशेषज्ञों ने उपलब्ध अवशेषों और टैटू की जानकारी के साथ चेहरे का डिजिटल पुनर्निर्माण किया। यह पुनर्निर्मित तस्वीर सोशल मीडिया और पुलिस नेटवर्क पर साझा की गई—और यहीं से केस ने रफ्तार पकड़ी।
कुछ ही घंटों में तस्वीर से मैच मिला। तकनीकी टीम ने पोस्ट की डिजिटल ट्रेल खंगाली, संदिग्ध प्रोफाइल्स की IP ट्रैकिंग की गई और पीड़िता की पहचान स्थापित हो गई। पहचान होते ही संपर्कों की जांच शुरू हुई, कॉल डिटेल्स और लोकेशन डेटा का विश्लेषण किया गया। इसी क्रम में पुलिस पीड़िता के करीबी रिश्तों तक पहुंची—और संदेह की सुई उसके प्रेमी पर टिक गई।
जांच में सामने आया कि आरोपी, जिसे पुलिस ने ‘सनी’ के रूप में पहचाना है, ने निजी विवाद के बाद महिला का गला घोंटकर हत्या कर दी। सबूत मिटाने के इरादे से शव को कार में रखकर एक्सप्रेसवे पर फेंक दिया गया। पुलिस के मुताबिक, AI आधारित विश्लेषण—फेसियल रिकंस्ट्रक्शन, सोशल मीडिया मैचिंग और डिजिटल ट्रैकिंग—की बदौलत यह ब्लाइंड मर्डर केस महज 24 घंटे में सुलझा।
वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इस मामले में तकनीक ने मानव जांच को गति दी। “AI ने पहचान की बाधा तोड़ी, लेकिन गिरफ्तारी तक पहुंचने में फील्ड इन्वेस्टिगेशन, डिजिटल फॉरेंसिक्स और पारंपरिक पुलिसिंग—तीनों का समन्वय निर्णायक रहा,” एक अधिकारी ने बताया। आरोपी से पूछताछ जारी है और फॉरेंसिक रिपोर्ट्स को केस डायरी में जोड़ा जा रहा है।
यह मामला कानून-व्यवस्था में तकनीक के जिम्मेदार इस्तेमाल की मिसाल बनकर सामने आया है। जहां पहले ऐसे मामलों में हफ्तों या महीनों लग जाते थे, वहीं यहां डाटा, विश्लेषण और मानवीय जांच के संयोजन ने समय बचाया और न्याय की दिशा में तेज कदम बढ़ाए। पुलिस ने संकेत दिए हैं कि भविष्य में अज्ञात शवों और जटिल अपराधों की जांच में AI टूल्स का इस्तेमाल और बढ़ाया जाएगा—लेकिन कानूनी प्रक्रियाओं और निजता के मानकों के भीतर रहकर।
यमुना एक्सप्रेसवे का यह केस दिखाता है कि तकनीक कातिल नहीं, कातिलों तक पहुंचने का औज़ार बन रही है—बशर्ते उसे सटीक तथ्यों, कड़े कानून और जिम्मेदार पुलिसिंग के साथ जोड़ा जाए।




