हरियाणा में दलित IPS अधिकारी वाई. पूरन कुमार की आत्महत्या ने पूरे राज्य की राजनीति को हिला दिया है। सीनियर ADGP रैंक के अधिकारी द्वारा उठाए गए इस कदम ने न केवल पुलिस महकमे में सनसनी फैला दी है, बल्कि बीजेपी सरकार को भी रक्षात्मक मुद्रा में ला खड़ा किया है।
पूरन कुमार ने अपने सुसाइड नोट में कथित रूप से उत्पीड़न और मानसिक दबाव का ज़िक्र किया था। सूत्रों के मुताबिक, उन्होंने कई बार अपने वरिष्ठ अधिकारियों और सरकार को संकेत दिया था कि उनके साथ भेदभाव और दफ्तर में अनुचित व्यवहार किया जा रहा है, लेकिन उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।
कांग्रेस ने इस मामले को लेकर सरकार पर सीधा हमला बोला है। पार्टी के वरिष्ठ नेता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा, “जब एक ADGP स्तर के अधिकारी को न्याय नहीं मिल पा रहा है, तो आम नागरिक की स्थिति क्या होगी? यह घटना पूरे सिस्टम पर कलंक है।”
कांग्रेस ने मांग की है कि इस मामले की न्यायिक जांच कराई जाए और दोषी अधिकारियों को तुरंत निलंबित किया जाए। वहीं, विपक्ष के अन्य दलों ने भी मुख्यमंत्री से नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की मांग की है।
बीजेपी सरकार ने फिलहाल इस पूरे मामले पर संवेदना जताते हुए जांच के आदेश दिए हैं। मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने बयान जारी कर कहा है, “सरकार पूरी पारदर्शिता के साथ जांच कराएगी। दोषी चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, बख्शा नहीं जाएगा।”
लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी है, क्योंकि दलित अधिकारियों के साथ भेदभाव के कई मामले पहले भी सामने आ चुके हैं, जिनमें कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
इस घटना के बाद राज्य के अफसरशाही और राजनीतिक गलियारों में एक असहज चुप्पी छा गई है। सोशल मीडिया पर भी #JusticeForYPuranKumar ट्रेंड कर रहा है, और कई पूर्व आईपीएस अधिकारियों ने इसे “सिस्टम की विफलता” बताया है। अगर इस मामले की जांच में लापरवाही हुई तो यह न केवल सरकार की साख पर असर डालेगी, बल्कि दलित समुदाय के बीच राजनीतिक समीकरणों को भी बदल सकती है — क्योंकि आने वाले चुनावों में हरियाणा की दलित आबादी निर्णायक भूमिका निभाने वाली है।




