नई दिल्ली 8 नवंबर 2025
केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू ने जैसे ही यह घोषणा की कि संसद का शीतकालीन सत्र 1 दिसंबर से 19 दिसंबर तक चलेगा, राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई। यह सिर्फ एक तारीख़ भर की घोषणा नहीं है — यह देश के संसदीय कैलेंडर और लोकतंत्र के चरित्र का संकेत है। सवाल यह उठता है कि क्या यह सत्र सरकार की जवाबदेही बढ़ाएगा या सत्ता की चालाकियों का एक और ‘फास्ट-ट्रैक शो’ साबित होगा?
यह सत्र इसलिए भी खास है क्योंकि यह उस समय आ रहा है जब देश के कई राज्यों में विधानसभा चुनाव या तो पूरे हो चुके हैं या उनके नतीजे आने वाले हैं। ऐसे में केंद्र सरकार के लिए संसद में अपनी “राजनीतिक उपलब्धियाँ” दिखाने का मौका होगा, जबकि विपक्ष के लिए यह सवाल उठाने का समय होगा कि जनता के मुद्दे — बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की समस्याएँ और संस्थाओं की निष्पक्षता — आखिर कब चर्चा का विषय बनेंगे। लेकिन जब सत्र की अवधि सिर्फ 19 दिन रखी गई है, तो यह चिंता स्वाभाविक है कि सरकार ने एक बार फिर लोकतांत्रिक विमर्श के लिए जगह नहीं छोड़ी है।
बीते कुछ वर्षों में एक प्रवृत्ति दिखाई दी है — संसद के सत्र धीरे-धीरे संक्षिप्त और नियंत्रित होते जा रहे हैं। पहले जहां मानसून और शीतकालीन सत्र लंबी बहस और विस्तृत विधेयक-प्रक्रिया के लिए जाने जाते थे, अब वे “औपचारिक सत्र” बनते जा रहे हैं। 19 दिनों का यह सत्र भी उसी क्रम में देखा जा रहा है — जहाँ बड़ी नीतियों पर चर्चा के बजाय, सरकार तयशुदा बिलों को तेजी से पास कराने की कोशिश करेगी। संसद को जनता की आवाज़ सुनने का मंच बनने के बजाय “एक मंजूरी मशीन” बना देना लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
किरण रिजिजू ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की स्वीकृति का हवाला देते हुए सत्र की घोषणा की, लेकिन इस बार की तारीख़ें यह भी बताती हैं कि सत्ता-प्रशासन चुनावी व्यस्तता को ध्यान में रखकर सत्र की अवधि सीमित कर रहा है। इसका एक सीधा नुकसान यह है कि विपक्ष को किसी भी विषय पर लंबी बहस का अवसर नहीं मिलेगा। संसद में “शून्यकाल” और “प्रश्नकाल” जैसी प्रक्रियाएँ महज़ रस्म-अदायगी बन जाती हैं, जब समय का आधा हिस्सा औपचारिक भाषणों या विधेयक पेश करने में ही चला जाता है।
यह भी याद रखना चाहिए कि इस सत्र में कई संवेदनशील बिल पेश हो सकते हैं — जिनमें सामाजिक न्याय, शिक्षा, चिकित्सा उपकरण विनियमन, और संभवतः Waqf Amendment Bill जैसे विषय शामिल हो सकते हैं। लेकिन जब समय सीमित होगा, तो इन पर गहराई से चर्चा की संभावना नगण्य रहेगी। संसद का असली मूल्य तभी है जब वहाँ विपरीत विचारों को बराबर जगह मिले, बहस हो, टकराव हो, और अंत में समझौता निकल कर आए। अगर संसद केवल सत्ता की सहमति के लिए काम करेगी, तो वह जनता की नहीं, सत्ता की संस्था बन जाएगी।
इस सत्र की तारीखें यह भी दर्शाती हैं कि सरकार ने इसे चुनावी राजनीति के समांतर चलने वाला आयोजन बना दिया है। दिसंबर के पहले पखवाड़े में ही पाँच राज्यों के चुनाव परिणाम आने हैं — ऐसे में सत्ता पक्ष चाहेगा कि संसद में कोई अप्रिय या असहज स्थिति न बने। इसलिए यह सत्र ‘कम अवधि, कम जोखिम’ का उदाहरण माना जा रहा है। पर सवाल यह है कि जब संसद ही सत्ता की असहमति को सहने की जगह नहीं रही, तो लोकतंत्र की असली शक्ति कहाँ बचेगी?
लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से यह एक चेतावनी की घंटी है। संसद जनता की सर्वोच्च संस्था है, लेकिन यदि उसके सत्र औपचारिक और जल्दबाज़ी में निपटाए जाने लगें, तो यह संकेत है कि जनता की आवाज़ को सुनने की जगह घट रही है। संसद का शीतकालीन सत्र अब वह “बौद्धिक अखाड़ा” नहीं रहा जहाँ नीतियाँ बनती थीं और विचार टकराते थे। अब यह एक ‘कॉरपोरेट ब्रीफिंग’ की तरह हो गया है — तय तारीखें, तय स्क्रिप्ट, और तय परिणाम।
अंततः, किरण रिजिजू की यह घोषणा हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या संसद अब केवल सरकारी घोषणा-मंच रह गई है? क्या विपक्ष को सिर्फ “समय की कमी” के बहाने दरकिनार किया जाएगा? और क्या जनता को यह बताया जाएगा कि संसद की भूमिका पूरी हुई, जबकि चर्चा अधूरी रह गई?
अगर संसद का सत्र छोटा है, तो लोकतंत्र का दायरा भी सिकुड़ रहा है। 1 से 19 दिसंबर का यह सत्र इस बात की परीक्षा होगी कि क्या भारत की संसद अब भी जनता की संसद है — या फिर वह सत्ता की अनिवार्य औपचारिकता में बदल चुकी है।




