एबीसी नेशनल पार्क | नई दिल्ली/गाजियाबाद | 13 जनवरी 2026
दिल्ली से सटी यूपी सीमा पर स्थित मस्जिद कॉलोनी में अचानक हुई प्रशासनिक कार्रवाई ने सैकड़ों परिवारों की जिंदगी पलट दी। यूपी सरकार द्वारा करीब 300 घरों को सील किए जाने के बाद इलाके में हड़कंप मच गया। लोग अपने घरों के बाहर बैठे रोते नजर आए, बच्चे सहमे हुए थे और बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे खड़े दिखे। स्थानीय लोगों का कहना है कि उनके पास आधार कार्ड, वोटर आईडी, बिजली-पानी के बिल जैसे सभी जरूरी दस्तावेज मौजूद हैं, इसके बावजूद उन्हें बेघर कर दिया गया और कई घरों का सामान बाहर फेंक दिया गया।
ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि मस्जिद कॉलोनी में रहने वाले अधिकतर लोग गरीब तबके से हैं—मजदूर, रिक्शा चालक, घरेलू कामगार और दिहाड़ी पर काम करने वाले लोग। कई परिवार 10 से 15 साल से इसी जगह रह रहे थे। लोगों का सवाल है कि अगर यह इलाका अवैध था, तो इतने सालों तक प्रशासन ने कोई कार्रवाई क्यों नहीं की? और अगर कार्रवाई जरूरी थी, तो बिना नोटिस, बिना सुनवाई और बिना किसी वैकल्पिक व्यवस्था के यह कदम क्यों उठाया गया?
“कागज़ सब हैं, फिर भी घर छिन गया”
स्थानीय लोगों का आरोप है कि जब प्रशासन की टीम पहुंची, तो किसी को अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया गया। महिलाएं हाथ जोड़कर गुहार लगाती रहीं, लेकिन कार्रवाई नहीं रुकी। एक महिला ने रोते हुए कहा, “हम कहां जाएं? हमारे पास आधार है, वोटर कार्ड है, बच्चों का स्कूल यहीं है… फिर भी हमारा घर छीन लिया गया।”
लोगों का कहना है कि कार्रवाई के दौरान घरों से सामान बाहर फेंक दिया गया, कई जगहों पर तोड़फोड़ भी हुई। परिवारों को बस यही बताया गया कि यह जमीन यूपी की है और यहां रहना गैरकानूनी है।
दिल्ली–यूपी सीमा का भ्रम, सबसे बड़ा संकट
मस्जिद कॉलोनी दिल्ली और यूपी की सीमा पर बसी हुई है। इसी वजह से यहां रहने वाले लोग सालों से खुद को दिल्ली का निवासी मानते रहे। उनके ज्यादातर दस्तावेज—आधार, वोटर आईडी, राशन कार्ड—दिल्ली के पते पर बने हुए हैं।
अब यूपी सरकार की कार्रवाई के बाद लोग सवाल उठा रहे हैं—अगर यह इलाका यूपी का है, तो दिल्ली के पते पर दस्तावेज कैसे बने? और अगर यह दिल्ली का है, तो यूपी सरकार ने कार्रवाई कैसे कर दी? इस सीमा विवाद ने आम लोगों को सबसे ज्यादा असमंजस और परेशानी में डाल दिया है।
दिल्ली की मुख्यमंत्री कहां हैं?
इस पूरे मामले में दिल्ली सरकार की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। बेघर हुए लोग पूछ रहे हैं कि जब उनके कागज़ दिल्ली के हैं, तो दिल्ली सरकार उनकी जिम्मेदारी क्यों नहीं ले रही? अब तक न तो कोई मंत्री मौके पर पहुंचा है और न ही राहत या पुनर्वास को लेकर कोई ठोस घोषणा की गई है। लोगों को डर है कि अगर जल्द कोई समाधान नहीं निकला, तो वे सड़क पर ही रहने को मजबूर हो जाएंगे।
मानवीय संकट में बदलती कार्रवाई
विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि अतिक्रमण हटाना प्रशासन का अधिकार हो सकता है, लेकिन इंसानियत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बिना नोटिस, बिना सुनवाई और बिना पुनर्वास के सैकड़ों लोगों को बेघर करना एक गंभीर मानवीय संकट को जन्म देता है।
आज मस्जिद कॉलोनी में सवाल सिर्फ जमीन का नहीं है, सवाल यह है कि गरीब आदमी की पहचान क्या है? अगर कागज़ भी काम न आएं, तो वह इंसान आखिर भरोसा किस पर करे?




