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जब बीजेपी में भी नहीं बन सकते CM तो फिर भूपेन बोरा ने क्यों छोड़ी कांग्रेस?

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गुवाहाटी | 18 फरवरी 2026

असम की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि मुख्यमंत्री पद की कुर्सी भारतीय जनता पार्टी में पहले से ही सुरक्षित और स्पष्ट रूप से Himanta Biswa Sarma के पास है, तो फिर पूर्व असम कांग्रेस अध्यक्ष Bhupen Kumar Borah ने कांग्रेस छोड़कर Bharatiya Janata Party का दामन थामने का निर्णय क्यों लिया? 22 फरवरी 2026 को उनके औपचारिक रूप से बीजेपी में शामिल होने की घोषणा ने राजनीतिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। यह सिर्फ दल-बदल की सामान्य घटना नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे असम के बदलते राजनीतिक परिदृश्य का संकेत माना जा रहा है, जहां व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, संगठनात्मक असंतोष और चुनावी गणित एक साथ काम करते दिखाई दे रहे हैं।

भूपेन बोरा लंबे समय तक कांग्रेस के सक्रिय और प्रमुख चेहरों में गिने जाते रहे हैं। असम प्रदेश कांग्रेस कमेटी (APCC) के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने संगठन को पुनर्जीवित करने की कोशिश की, लेकिन लगातार चुनावी पराजयों और आंतरिक मतभेदों ने पार्टी की स्थिति कमजोर कर दी। सूत्रों के अनुसार, पार्टी के भीतर नेतृत्व शैली, निर्णय प्रक्रिया और रणनीतिक दिशा को लेकर असहमति थी। बोरा खुद को सीमित दायरे में महसूस कर रहे थे, जहां उनके राजनीतिक अनुभव और प्रभाव का पूरा उपयोग नहीं हो पा रहा था। ऐसे में उनका यह कदम सीधे मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा से अधिक, राजनीतिक प्रासंगिकता और भविष्य की भूमिका सुनिश्चित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि राजनीति केवल पद की दौड़ नहीं होती, बल्कि प्रभाव और अवसर की भी होती है। भले ही बीजेपी में मुख्यमंत्री पद की संभावना तत्काल नजर नहीं आती, लेकिन सत्ताधारी दल में शामिल होना अपने आप में शक्ति-संतुलन बदल देता है। सत्ता के करीब रहने से नीतिगत निर्णयों में भागीदारी, संगठन में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी और क्षेत्रीय स्तर पर प्रभाव बढ़ाने के अवसर मिलते हैं। हिमंता बिस्वा सरमा ने भी संकेत दिया है कि बोरा को पार्टी में सम्मानजनक स्थान दिया जाएगा। इससे स्पष्ट होता है कि यह कदम दीर्घकालिक राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हो सकता है।

दूसरी ओर, कांग्रेस के लिए यह घटनाक्रम मनोवैज्ञानिक और संगठनात्मक झटका है। विधानसभा चुनाव से पहले प्रदेश अध्यक्ष स्तर के नेता का पार्टी छोड़ना कार्यकर्ताओं के मनोबल को प्रभावित कर सकता है। विपक्ष पहले ही संसाधनों और नेतृत्व की स्पष्टता को लेकर संघर्ष कर रहा है। ऐसे समय में वरिष्ठ नेता का जाना यह संदेश देता है कि पार्टी के भीतर असंतोष गहरा है। हालांकि कांग्रेस इसे व्यक्तिगत निर्णय बता रही है, लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसका प्रभाव व्यापक हो सकता है।

बीजेपी के नजरिए से देखें तो यह कदम चुनावी रणनीति का हिस्सा प्रतीत होता है। असम में बीजेपी पहले ही मजबूत स्थिति में है, और विपक्ष के प्रमुख चेहरों को अपने साथ जोड़ना उसके लिए दोहरा लाभ है—एक तरफ संगठन मजबूत होता है, दूसरी ओर विपक्ष कमजोर पड़ता है। यह राजनीतिक संदेश भी जाता है कि सत्ता पक्ष में स्थिरता और अवसर अधिक हैं। हिमंता बिस्वा सरमा स्वयं कांग्रेस से बीजेपी में आकर मुख्यमंत्री बने थे, इसलिए यह बदलाव असम की राजनीति में असामान्य नहीं माना जा रहा।

अंततः सवाल यह नहीं है कि भूपेन बोरा मुख्यमंत्री बनेंगे या नहीं, बल्कि यह है कि वे अपनी राजनीतिक यात्रा को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं। संभव है कि उनका लक्ष्य संगठन में प्रभावशाली भूमिका निभाना, भविष्य में मंत्रिमंडल में स्थान पाना या क्षेत्रीय राजनीति में अपना आधार मजबूत करना हो। राजनीति संभावनाओं का खेल है और आज का निर्णय आने वाले वर्षों में बड़े बदलाव का कारण बन सकता है।

अब 22 फरवरी को होने वाला उनका औपचारिक शामिल होना केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि असम की राजनीति के नए अध्याय की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले चुनाव इस फैसले के वास्तविक प्रभाव को तय करेंगे।

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