अवधेश कुमार | नई दिल्ली 17 नवंबर 2025
आज भारत की राजनीति का सबसे बड़ा विडंबनात्मक दृश्य यह है कि वोट चोरी से लगातार जीतने वाली पार्टी ने लोकतंत्र पर एकाधिकार कर रखा है—और उसी पार्टी की गुलामी में डूबे हुए तथाकथित ‘बौद्धिक’ लोग विपक्ष को कोसने को ही अपना राष्ट्रीय कर्तव्य मान बैठे हैं। दिलचस्प यह है कि इन बुद्धिजीवियों ने अपनी सोच का टेंडर भी उसी सत्ता के आगे गिरवी रख दिया है जो हर उस आवाज़ को कुचलना चाहती है जो सत्ता की सच्चाई को बेनकाब कर दे। यही वजह है कि मोदी सरकार की हर आलोचना से पहले ये ‘बुद्धिजीवी’ जनता को यह समझाने में लग जाते हैं कि विपक्ष नाम की कोई चीज़ बची ही नहीं, राहुल गांधी और कांग्रेस किसी लाइक नहीं है, और देश में बीजेपी के मुकाबले कोई विकल्प नहीं। असल में यह वो लोग हैं जो यह स्वीकारने से इनकार करते हैं कि जब हर संस्था को शासक दल का चरखा दास बना दिया जाए, तो विपक्ष मजबूत कैसे रहेगा? जिन संस्थाओं को संविधान ने स्वतंत्र बनाया था, वही संस्थाएं आज सत्ता की गुलामी में झुककर लोकतंत्र की रीढ़ तोड़ चुकी हैं।
इसी माहौल में तवलीन सिंह का हालिया बयान आता है, जो हमेशा से मोदी सरकार के गुणगान का अघोषित स्तंभ रही हैं। उन्होंने उपदेश देते हुए लिखा—“The biggest threat to Indian democracy is that we lack a strong opposition party. The Congress must revive its dead grassroots.” यानी लोकतंत्र पर खतरा बीजेपी की मनमानी, संस्थाओं की गुलामी, चुनावी धांधली, और सत्ता के दुरुपयोग से नहीं… बल्कि खतरों की जड़ है कि कांग्रेस कमजोर है! यह बिल्कुल वैसा ही तर्क है जैसे किसी घायल को दोष देकर कह दिया जाए कि अपराधी इसलिए बच गया क्योंकि पीड़ित भाग नहीं पाया। तवलीन सिंह की यह सोच वही पुरानी मानसिकता है जो दोष हमेशा प्रतिपक्ष पर डालकर सत्तापक्ष को मुक्त करती है। इनमें वह ईमान नहीं कि वे कह सकें—शक्तियों का दुरुपयोग, एजेंसियों का हथियार बने रहना और चुनावी फ़ायदे के लिए पूरे सिस्टम को हाईजैक कर लेना… यही लोकतंत्र का असली खतरा है।
लेकिन इस बार जवाब आया संजय हेगड़े की तरह सीधी रीढ़ वाले लोगों से। हेगड़े ने साफ शब्दों में लिखा कि लोकतंत्र का असली हत्यारा वह ‘सिस्टम’ है जो पूरे देश को यह जताने में जुटा है कि “आएगा तो मोदी ही।” इस एक वाक्य ने जनता के भीतर वह सबसे खतरनाक मानसिकता पैदा कर दी है जहाँ लोग अब मानने लगे हैं कि सरकार बदली ही नहीं जा सकती। यह वह मानसिक पतन है जहां चुनाव सिर्फ औपचारिकता रह जाते हैं और सत्ता हटाने का लोकतांत्रिक विश्वास खत्म हो जाता है। जब जनता मान ले कि उनका वोट किसी काम का नहीं, जब प्रशासन समझ ले कि चाहे जितना अत्याचार करो सत्ता नहीं जाएगी, जब चुनाव अधिकारी यह मान लें कि वे निष्पक्ष नहीं बल्कि ‘सेवा’ में हैं—तब लोकतंत्र सिर्फ कागज़ पर बचता है। यही वह स्थिति है जिसकी ओर हेगड़े ने इशारा किया—“bread and circuses” यानी जनता को रोटी और तमाशे देकर सत्ता जो चाहे कर सकती है क्योंकि उन्हें पता है कि जवाबदेही का डर मिट चुका है।
सोशल मीडिया पर तो और भी कड़े शब्दों में जनता की बेचैनी सामने आई है—लोग लगातार कह रहे हैं कि भारत में चुनावों पर भरोसा अपने इतिहास में सबसे निचले स्तर पर पहुँच चुका है। वोटिंग प्रक्रिया पर सवाल, EVM को लेकर संदेह, अधिकारियों के पक्षपात, मीडिया द्वारा विपक्ष का सुनियोजित बहिष्कार और चुनाव आयोग की चुप्पी—सब कुछ मिलकर यह संकेत दे रहे हैं कि सत्ता अब नीचे से नहीं, ऊपर से तय हो रही है। आम मतदाता का विश्वास टूट चुका है कि वह अपनी सरकार बदल सकता है। यह लोकतंत्र की मौत का पहला चरण होता है—जब जनता को फैसला लेने का अधिकार सिर्फ सैद्धांतिक रह जाता है और व्यावहारिक रूप से सत्ता ‘बेहिसाब’ हो जाती है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे दर्दनाक सच यह है कि जो लोग लोकतंत्र की कब्र खुदते देख रहे हैं, वे ही सबसे पहले विपक्ष को दोष देकर असली अपराधियों को बचाते हैं। यदि संस्थाओं को आज़ाद रहने दिया जाता, यदि चुनावी प्रक्रिया पर जनता का भरोसा कायम रहता, यदि विपक्ष को कुचलने की सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल न होता, तो आज वही कांग्रेस, वही विपक्ष सत्ता को चुनौती दे सकता था। मगर जब पूरा मैदान ही तिरछा कर दिया जाए, तब हारने वाले खिलाड़ी को दोष देना न सिर्फ अन्याय है बल्कि साजिश को ढकने का तरीका है।
भारत का लोकतंत्र आज सवालों के कठघरे में है—और सवाल विपक्ष पर नहीं, सत्ता के उस ‘अथाह’ अहंकार पर है जो अपने आलोचकों को कुचलते-कुचलते अब जनता के वोट के भरोसे को भी कुचल चुका है।




