आलोक कुमार । नई दिल्ली 5 दिसंबर 2025
भारतीय राजनीति में प्रोटोकॉल, परंपरा और राजनीतिक शिष्टाचार का एक समृद्ध इतिहास रहा है। इसी इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना नवंबर 2012 की वह तस्वीर है, जिसमें कनाडा के तत्कालीन प्रधानमंत्री स्टीफ़न हार्पर भारत दौरे पर आए थे और उनके साथ मुलाक़ातों की श्रृंखला में एक अनोखा अध्याय जुड़ा था। उस समय भारत में यूपीए सरकार थी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हार्पर की मेज़बानी में व्यस्त थे। दिल्ली में उच्च स्तरीय वार्ताएँ चल रही थीं, कई समझौते साइन हुए और द्विपक्षीय रिश्तों पर विस्तृत बातचीत हुई। सब कुछ औपचारिकताओं और निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार आगे बढ़ रहा था—लेकिन दौरे के बीच एक ऐसी घटना हुई जिसने भारतीय लोकतंत्र की परंपराओं को दुनिया के सामने नए रूप में पेश किया।
बताया जाता है कि कनाडाई प्रधानमंत्री स्टीफ़न हार्पर के साथ आधिकारिक मुलाक़ातों के दौरान अचानक प्रोटोकॉल ऑफिसर के पास 10 जनपथ—यानी सोनिया गांधी के निवास—से एक संदेश आया। संदेश सरल था लेकिन राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण: “कनाडाई प्रधानमंत्री की मुलाक़ात हमारी नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज से भी कराई जाए।” लोकतांत्रिक मर्यादाओं और विपक्ष के प्रति सम्मान के इस सहज निर्णय ने भारतीय राजनीति का वह चेहरा दिखाया जो आज कम दिखाई देता है—वह चेहरा जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों ही राष्ट्रीय हित के मंच पर बराबरी से खड़े होते थे।
कुछ ही समय बाद सुषमा स्वराज स्टीफ़न हार्पर के साथ एक औपचारिक मीटिंग रूम में बैठी थीं। उनके बीच गहन बातचीत हो रही थी और दोनों देशों के झंडे औपचारिक गरिमा के साथ पृष्ठभूमि में लहरा रहे थे। यह केवल एक मुलाक़ात नहीं थी—यह लोकतांत्रिक परंपरा का प्रतीक था, जिसमें विपक्ष को न सिर्फ़ सम्मान मिलता था बल्कि अंतरराष्ट्रीय वार्ताओं और कूटनीतिक संवादों का भी हिस्सा बनाया जाता था। उस समय कोई यह प्रश्न नहीं उठाता था कि विपक्ष क्यों मिल रहा है या किसके कहने पर मिल रहा है। यह माना जाता था कि देश का प्रतिनिधित्व केवल सरकार नहीं करती—विपक्ष भी राष्ट्र के हित का ही संवाहक है।
आज जब राहुल गांधी राजनीति की गिरती परंपराओं और विपक्ष के प्रति बढ़ती असहिष्णुता पर बात करते हैं, तो वे इसी मिसाल की ओर इशारा करते हैं। वह याद दिलाते हैं कि भारतीय लोकतंत्र में कभी ऐसा दौर था जब 10 जनपथ स्वयं पहल करके यह सुनिश्चित करता था कि विदेश नीति और कूटनीति केवल सत्ता पक्ष तक सीमित न रह जाए। विपक्ष को बराबर का सम्मान, बराबर का स्थान और बराबर की भागीदारी मिलती थी। यह केवल शिष्टाचार नहीं, बल्कि एक स्वस्थ और परिपक्व लोकतंत्र का संकेत था।
2012 की वह तस्वीर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह उस राजनीतिक संस्कृति का दस्तावेज़ है जिसमें मतभेदों के बावजूद देश की एकता और अंतरराष्ट्रीय छवि दोनों को प्राथमिकता दी जाती थी। सत्ता और विपक्ष के बीच की दूरी इतनी नहीं थी कि वे देश के हितों के लिए साथ न बैठ सकें। सुषमा स्वराज की कूटनीतिक समझ, उनकी वाकपटुता और उनकी गरिमा ने कनाडा के प्रधानमंत्री के सामने भारत का संतुलित और व्यापक दृष्टिकोण पेश किया।
आज, जब राजनीतिक माहौल ध्रुवीकरण से भरा हुआ है और विपक्ष को कई बार राष्ट्रीय विमर्श से बाहर धकेलने की कोशिश की जाती है, तब 2012 का यह प्रसंग एक आईने की तरह हमारे सामने खड़ा होता है। यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल सत्ता का खेल नहीं—बल्कि सम्मान, संवाद और सहभागिता की संस्कृति है। वह संस्कृति जिसे बचाने की बात राहुल गांधी करते हैं, और जिसे समय की धूल से निकालकर फिर से उजागर करने की आवश्यकता है।




