एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 12 फरवरी
लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष Rahul Gandhi ने केंद्र सरकार के खिलाफ सीधा मोर्चा खोलते हुए ऐलान किया है कि चाहे उनके खिलाफ FIR दर्ज हो, मुकदमा चले या संसद में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया जाए — वह किसानों के मुद्दे पर पीछे नहीं हटेंगे।
राहुल गांधी ने दो टूक कहा, “जो भी ट्रेड डील किसानों की रोज़ी-रोटी छीने या देश की खाद्य सुरक्षा को कमजोर करे, वह किसान-विरोधी है। अन्नदाताओं के हितों से समझौता नहीं होने देंगे।”
“सवाल पूछना गुनाह नहीं”
राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों के जरिए कृषि क्षेत्र को नुकसान पहुंचा सकती है। उनका कहना है कि यदि किसी भी डील से भारतीय किसानों की आय, न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था या खाद्य सुरक्षा पर असर पड़ता है, तो वह उसका खुलकर विरोध करेंगे।
उन्होंने यह भी संकेत दिया कि संसद के भीतर और बाहर दोनों जगह इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया जाएगा।
निशिकांत दुबे की पहल, सियासी घमासान तेज
इसी बीच बीजेपी सांसद Nishikant Dubey ने राहुल गांधी की लोकसभा सदस्यता रद्द करने की पहल की है। दुबे न केवल सदस्यता समाप्त करने बल्कि भविष्य में राहुल गांधी के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने की मांग भी उठा रहे हैं।
बीजेपी खेमे का आरोप है कि राहुल गांधी के बयान देश की छवि और संस्थाओं पर सवाल खड़े करते हैं। वहीं कांग्रेस और विपक्ष का कहना है कि यह “सवालों को दबाने की कोशिश” है।
किताब, ट्रेड डील और ‘एपिस्टिन फाइल’ पर हमले
राहुल गांधी हाल के दिनों में पूर्व थलसेनाध्यक्ष M. M. Naravane की किताब में लिखी बातों को लेकर भी सवाल उठा चुके हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित ‘एपिस्टिन फाइल’ से जुड़े मुद्दों पर भी उन्होंने सरकार से जवाब मांगा है।
विपक्ष का आरोप है कि राहुल गांधी लगातार ट्रेड डील में भारत को संभावित नुकसान, संस्थागत पारदर्शिता और विदेश नीति से जुड़े सवाल उठा रहे हैं, जिससे सरकार असहज है।
“11 साल से सवालों का दमन”
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि पिछले 11 वर्षों में असहमति की आवाज़ों को दबाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। उनका आरोप है कि सरकार आलोचना को देश-विरोध से जोड़ देती है, जबकि लोकतंत्र में सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार और जिम्मेदारी दोनों है।
राहुल गांधी का स्पष्ट संदेश है — “डराने-धमकाने से आवाज़ नहीं दबेगी। किसानों के लिए लड़ाई जारी रहेगी।”
इस बयान के बाद संसद और सियासी गलियारों में टकराव और तेज होने के संकेत हैं। आने वाले दिनों में यह मुद्दा राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा केंद्र बन सकता है।



