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WATCH VIDEO नेशनल हेराल्ड पर कानून जीता, ED-CBI की सियासी साजिश बेनकाब : अभिषेक मनु सिंघवी

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एबीसी 17 दिसंबर 2025

नेशनल हेराल्ड मामले में आए है क्या चुनाव यूअदालती आदेश के बाद कांग्रेस ने इसे कानून की जीत और राजनीतिक प्रतिशोध की हार बताया है। AICC के विधि, RTI और मानवाधिकार विभाग के चेयरमैन डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने विस्तार से कहा कि आज कानून ने शोर, अफवाह और राजनीतिक फिक्शन से कहीं ज़्यादा ऊँची आवाज़ में बात की है। उनके मुताबिक, एक अनुपस्थित और वर्षों तक टलती रही FIR के आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग का “महल” खड़ा किया गया, लेकिन न्यायिक निगरानी के सामने जांच एजेंसियों का अतिरेक उजागर हो गया।

डॉ. सिंघवी ने स्पष्ट किया कि अदालतें राजनीतिक स्क्रिप्ट का मंच नहीं होतीं, बल्कि वे ड्यू प्रोसेस यानी विधिसम्मत प्रक्रिया के मंदिर हैं। उन्होंने इस पूरे मामले को तथ्यों के आधार पर किए गए उत्पीड़न और राजनीतिक बदले का उदाहरण बताया। उनके अनुसार, जिन घटनाओं को आधार बनाकर मामला आगे बढ़ाया गया, वे 2014 से काफी पहले की थीं, जिन पर डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी की निजी शिकायत के बाद 2014 में समन आदेश आया।

उन्होंने बताया कि 2014 से 2021 तक—पूरे सात वर्षों में CBI और ED ने लिखित रूप से यह राय दी कि कोई प्रेडिकेट ऑफेंस (मूल अपराध) बनता ही नहीं है। यही कारण था कि 2014 के बाद एजेंसियों ने कोई नई शिकायत दर्ज नहीं की। लेकिन जून 2021 में अचानक—डॉ. सिंघवी के शब्दों में—“आसमान से आदेश” आया और ECIR दर्ज कर दी गई, जिससे जांच की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

डॉ. सिंघवी ने कहा कि 2021 से 2025 तक कांग्रेस के शीर्ष नेताओं—सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे सहित कई अन्य—से करीब 90 घंटे पूछताछ की गई, जो जांच से अधिक उत्पीड़न का रूप ले चुकी थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि इतनी लंबी पूछताछ के बावजूद एक भी पैसे का लेन-देन, एक भी संपत्ति का स्थानांतरण या मनी लॉन्ड्रिंग का कोई ठोस साक्ष्य सामने नहीं आया।

उन्होंने अदालती आदेश का हवाला देते हुए कहा कि PMLA की धारा 5 लागू करने के लिए प्रेडिकेट ऑफेंस अनिवार्य है—और इस मामले में वह पाया ही नहीं गया। इसके बावजूद 3 अक्टूबर 2025 को नई FIR दर्ज की गई, जिसे डॉ. सिंघवी ने “मामले को ज़िंदा रखने” की कोशिश करार दिया।

डॉ. सिंघवी ने यह भी रेखांकित किया कि यह PMLA का पहला ऐसा मामला है, जिसमें मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप तो लगाया गया, लेकिन न एक पैसा हिला, न एक संपत्ति खिसकी। उन्होंने स्पष्ट किया कि AJL अपनी सभी अचल संपत्तियों की स्वामी बनी हुई है; AJL द्वारा कर्ज को इक्विटी में बदलना एक सामान्य कॉरपोरेट प्रक्रिया है, जिसे शेयर जारी कर किया जाता है।

उन्होंने आगे कहा कि Young Indian एक नॉन-प्रॉफिट कंपनी है, जहां बैठे लोग न वेतन लेते हैं, न लाभांश, न गाड़ियां, न हवाई जहाज़, न कोई व्यक्तिगत लाभ। ऐसे में मनी लॉन्ड्रिंग का आरोप तथ्यों से कोसों दूर है।

डॉ. सिंघवी ने कहा कि आपराधिक कानून कोई प्रेस रिलीज़ नहीं होता। PMLA को हथियार बनाकर कानून की शर्तों से आंख मूंदना स्वीकार्य नहीं है। उनके शब्दों में, यह मामला हमेशा बयानबाज़ी में लंबा और सबूतों में छोटा रहा है—और आज का आदेश उसी सच्चाई की पुष्टि करता है।

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