महेंद्र कुमार | नई दिल्ली | 13 जनवरी 2026
भारतीय जनता पार्टी ने खुद ट्वीट कर यह जानकारी दी कि चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के इंटरनेशनल लाइजन डिपार्टमेंट (ILD) का एक प्रतिनिधिमंडल, वाइस मिनिस्टर सुन हैयान के नेतृत्व में, बीजेपी मुख्यालय पहुँचा और बीजेपी तथा आरएसएस से जुड़े वरिष्ठ अधिकारियों से उसकी बैठक हुई। तस्वीरें भी जारी की गईं, मुस्कानें भी दिखीं और “आपसी संवाद बढ़ाने” की बातें भी सामने आईं। लेकिन इसी बीच एक ऐसा सवाल देश के सामने खड़ा हो गया है, जिसे बीजेपी और आरएसएस अब तक नजर अंदाज़ कर रहे हैं—क्या इस बैठक में चीन को शक्सगाम घाटी और पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) पर उसके दावे को लेकर कड़ा विरोध दर्ज कराया गया?
हैरानी की बात यह है कि ठीक इसी समय चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता सार्वजनिक रूप से यह कह चुकी हैं कि PoK में स्थित शक्सगाम घाटी चीन का हिस्सा है और वहां जो निर्माण कार्य चल रहा है, वह “वैध” है। यह वही शक्सगाम घाटी है, जिसे भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है और जिस पर चीन ने पाकिस्तान के साथ मिलीभगत कर कब्ज़ा किया हुआ है। ऐसे संवेदनशील और गंभीर मुद्दे पर, जब चीन खुलकर भारत की संप्रभुता को चुनौती दे रहा है, तब बीजेपी–CPC की यह मुलाकात सिर्फ़ “इंटर पार्टी संवाद” तक सीमित कैसे रह गई?
देश जानना चाहता है कि जब चीन की सत्तारूढ़ पार्टी के वरिष्ठ नेता बीजेपी दफ्तर में बैठे थे, तब क्या शक्सगाम घाटी, PoK, अरुणाचल, गलवान और लद्दाख का मुद्दा मेज़ पर रखा गया या नहीं? अगर रखा गया, तो चीन को क्या साफ़ संदेश दिया गया? और अगर नहीं रखा गया, तो क्यों नहीं? क्या राष्ट्रीय हित से जुड़े सवालों पर चुप्पी साध लेना अब “कूटनीति” कहलाने लगा है?
बीजेपी और आरएसएस अक्सर राष्ट्रवाद, अखंड भारत और “एक इंच ज़मीन भी नहीं छोड़ेंगे” जैसे नारों के साथ जनता के बीच जाते हैं। लेकिन जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ बंद कमरे में बैठक होती है, तब वही सख़्ती, वही तेवर और वही राष्ट्रवादी भाषा क्यों गायब हो जाती है? क्या यह दोहरा चरित्र नहीं है—एक तरफ़ मंचों से चीन को लाल आंख दिखाने का दावा, और दूसरी तरफ़ पार्टी-टू-पार्टी मीटिंग में असहज चुप्पी?
यह भी सवाल उठता है कि यह बैठक किस हैसियत से हुई? विदेश नीति तय करना भारत सरकार और विदेश मंत्रालय का काम है। तो फिर बीजेपी और आरएसएस, एक राजनीतिक संगठन के तौर पर, चीन की सत्तारूढ़ पार्टी से क्या अलग कूटनीति चला रहे हैं? क्या यह समानांतर विदेश नीति है? और अगर है, तो इसकी जानकारी संसद और देश की जनता को क्यों नहीं दी जा रही?
देश की जनता सिर्फ़ तस्वीरें और शिष्टाचार भरे ट्वीट नहीं, बल्कि स्पष्ट जवाब चाहती है। क्या चीन को यह साफ़ कहा गया कि शक्सगाम घाटी भारत की है? क्या यह दर्ज कराया गया कि PoK में कोई भी निर्माण भारत की संप्रभुता का उल्लंघन है? या फिर यह बैठक सिर्फ़ “मधुर संबंधों” और औपचारिक बातों तक सीमित रही, ताकि असहज सवालों से बचा जा सके?
बीजेपी और आरएसएस को यह समझना होगा कि चीन कोई सामान्य देश नहीं है। वह भारत की ज़मीन पर दावा करता है, सैनिक झड़पों में हमारे जवान शहीद हुए हैं, और आज भी सीमा पर तनाव बना हुआ है। ऐसे में चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ हुई हर बैठक पर पारदर्शिता और जवाबदेही अनिवार्य है। राष्ट्रवाद का मतलब सिर्फ़ नारे लगाना नहीं, बल्कि सही समय पर सही सवाल उठाना और सख़्त बात कहना भी है। गेंद बीजेपी और आरएसएस के पाले में है। देश पूछ रहा है—शक्सगाम पर आपकी आवाज़ कहाँ थी? अगर आपत्ति जताई गई, तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? और अगर नहीं जताई गई, तो यह चुप्पी किसके हित में है—देश के या किसी और के?




