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WATCH VIDEO — मोदी 100 साल चुनाव जीत लें, तब भी नेहरू की विरासत की बराबरी नहीं कर सकते : मनोज झा

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एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026

संसद में मनोज झा का जोरदार बयान, नेहरू को बताया लोकतांत्रिक भारत का प्रतीक

राज्यसभा में सोमवार को हुई बहस के दौरान राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के वरिष्ठ नेता और सांसद Manoj Kumar Jha ने देश के प्रथम प्रधानमंत्री Jawaharlal Nehru को लेकर एक प्रभावशाली और भावुक भाषण दिया, जिसने सदन के भीतर और बाहर दोनों जगह राजनीतिक चर्चा को तेज कर दिया है।

मनोज झा ने अपने संबोधन में कहा, “अगर आप 100 साल तक भी चुनाव जीतते रहें, तब भी पंडित नेहरू की विरासत की बराबरी नहीं कर सकते।” उन्होंने कहा कि नेहरू केवल एक प्रधानमंत्री नहीं थे, बल्कि भारतीय संसदीय लोकतंत्र की आत्मा थे। झा के अनुसार, आज जो लोकतांत्रिक संस्थाएं—संसद, न्यायपालिका, स्वतंत्र मीडिया और संघीय ढांचा—देश की पहचान हैं, उनकी मजबूत नींव आजादी के बाद के कठिन दौर में रखी गई थी।

उन्होंने कहा कि 1947 के बाद देश जिस भयावह दौर से गुजर रहा था, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। विभाजन की त्रासदी, सांप्रदायिक हिंसा और आर्थिक संकट के बीच भारत को स्थिर लोकतांत्रिक ढांचे में ढालना आसान नहीं था। “जिस समय मंदिर-मस्जिद और हिंदू-मुस्लिम के नाम पर खून की नदियां बह रही थीं, उस समय नेहरू ने बदले की राजनीति नहीं, बल्कि निर्माण की राजनीति का रास्ता चुना,” झा ने कहा।

उनके इस बयान के दौरान सत्ता पक्ष के सदस्यों ने आपत्ति जताई और सदन में कुछ देर के लिए तीखी नोकझोंक भी हुई। हालांकि, मनोज झा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा कि किसी भी ऐतिहासिक व्यक्तित्व का मूल्यांकन केवल चुनावी जीत या हार से नहीं किया जा सकता। “नेहरू की विरासत विचारों में है, संस्थाओं में है, संविधान के प्रति आस्था में है—इसे केवल बहुमत की संख्या से नहीं तौला जा सकता,” उन्होंने जोड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विपक्ष मौजूदा राजनीतिक माहौल में नेहरू की विरासत को लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहा है। वहीं, सत्ता पक्ष का कहना है कि नेहरू की नीतियों की आलोचना करना लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है और इतिहास पर बहस से परहेज नहीं होना चाहिए।

फिलहाल, मनोज झा का यह भाषण सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है और समर्थकों के बीच इसे संसदीय बहस के प्रभावशाली क्षणों में से एक माना जा रहा है। यह स्पष्ट है कि नेहरू की विरासत पर बहस आने वाले समय में भी भारतीय राजनीति के केंद्र में बनी रहेगी।

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