एबीसी डेस्क 19 दिसंबर 2025
सीएलएटी 2026 में ऑल इंडिया रैंक-1 हासिल करने वाली गीताली गुप्ता की सफलता की कहानी आज के छात्रों के लिए एक बड़ी सीख है। गीताली ने यह साबित कर दिया कि टॉप करने के लिए न तो दिन-रात किताबों में डूबे रहना जरूरी है और न ही खुद पर अनावश्यक दबाव डालना। उनकी सफलता की असली कुंजी रही—संतुलित पढ़ाई, साफ सोच और खुद पर भरोसा।
गीताली ने अपनी तैयारी के दौरान कभी यह नहीं माना कि पढ़ाई का मतलब 24×7 किताबें खोलकर बैठना है। उन्होंने न तो अपने लिए कोई तय घंटे बांधे और न ही यह सोचकर पढ़ाई की कि “इतना नहीं पढ़ा तो दोषी महसूस करना चाहिए।” उनका मानना था कि पढ़ाई अपराधबोध से नहीं, समझ और रुचि से होनी चाहिए। वह हर दिन छोटे-छोटे लक्ष्य तय करती थीं और उन्हें पूरा करने पर ध्यान देती थीं। यही तरीका उन्हें मानसिक रूप से शांत और केंद्रित रखता रहा।
परीक्षा के दिन की बात करें तो गीताली बाहर निकलते वक्त खुद भी थोड़ी असमंजस में थीं। उन्हें लगा कि पेपर कठिन था, जैसा कि बाकी छात्रों से सुनने को मिला। लेकिन बाद में जब उन्होंने शांति से अपने उत्तरों का आकलन किया, तब समझ आया कि प्रदर्शन उम्मीद से बेहतर रहा है। यहीं से यह साफ होता है कि आत्म-विश्लेषण और धैर्य कितने अहम होते हैं।
गीताली फिलहाल कक्षा 12 की छात्रा हैं और उन्होंने ह्यूमैनिटीज स्ट्रीम चुनी है। राजनीति विज्ञान, इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र और अंग्रेज़ी जैसे विषयों ने उन्हें कानून की ओर आकर्षित किया। उनका कहना है कि पॉलिटिकल साइंस उनका पसंदीदा विषय है, क्योंकि यह समाज, सत्ता और न्याय को समझने में मदद करता है—और यही कानून की बुनियाद है।
दिलचस्प बात यह है कि ह्यूमैनिटीज की छात्रा होने के बावजूद गीताली को गणित से खास लगाव है। वह कहती हैं कि उन्हें मैथ्स से डर नहीं लगता, बल्कि उसमें मज़ा आता है। यही वजह है कि क्वांटिटेटिव सेक्शन में उनकी पकड़ मजबूत रही और यह उनकी बड़ी ताकत बनी।
गीताली ने सीएलएटी की तैयारी कक्षा 11 से शुरू की थी, लेकिन शुरुआती समय उन्होंने सिर्फ परीक्षा को समझने में लगाया। असली और गंभीर तैयारी कक्षा 11 के अंत और कक्षा 12 की शुरुआत से शुरू हुई। बोर्ड परीक्षा और सीएलएटी के बीच संतुलन बनाना उनके लिए आसान नहीं था, लेकिन स्कूल और कोचिंग संस्थान के सहयोग से उन्होंने दोनों को साथ-साथ संभाल लिया। रिकॉर्डेड क्लासेज और लचीले सिस्टम ने उन्हें काफी मदद की।
उनकी तैयारी का एक अहम हिस्सा था मॉक टेस्ट और उनका विश्लेषण। गीताली मानती हैं कि मॉक देना जरूरी है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है यह समझना कि गलती कहां हुई और क्यों हुई। वह हर मॉक के बाद अपनी कमजोरियों पर काम करती थीं, न कि सिर्फ स्कोर देखकर निराश होती थीं।
गीताली की रणनीति के तीन मजबूत आधार रहे—
पहला, खुद को दोषी महसूस कर पढ़ाई न करना।
दूसरा, मानसिक और शारीरिक सेहत का ख्याल रखना।
तीसरा, जरूरत पड़ने पर सही मार्गदर्शन लेना और सलाह मानना।
भविष्य की बात करें तो गीताली की पहली पसंद एनएलयू बेंगलुरु है। वह आगे चलकर कॉर्पोरेट लॉ में करियर बनाना चाहती हैं, हालांकि न्यायपालिका या सेना की JAG सेवा जैसे विकल्पों के लिए भी उनके मन के दरवाज़े बंद नहीं हैं।
कुल मिलाकर, गीताली गुप्ता की कहानी सिर्फ एक टॉपर की कहानी नहीं है, बल्कि यह आज के छात्रों के लिए एक संदेश है—कि सफलता शोर, डर और दबाव से नहीं, बल्कि समझ, संतुलन और आत्म-विश्वास से मिलती है।




