शैलेन्द्र नेगी | देहरादून 2 जनवरी 2025
अंकिता भंडारी हत्याकांड, जिसने कभी उत्तराखंड की शांत वादियों को झकझोर कर रख दिया था, एक बार फिर देश की अंतरात्मा को बेचैन कर रहा है। समय बीतने के साथ यह मामला इतिहास नहीं बना, बल्कि अब नए और अब तक असत्यापित आरोपों, कथित ऑडियो–वीडियो क्लिप और बीजेपी से जुड़े VIP एंगल के कारण और ज़्यादा सुलगता जा रहा है। सवाल अब सिर्फ़ यह नहीं है कि एक 19 वर्षीय युवती की निर्मम हत्या कैसे हुई, बल्कि यह भी है कि क्या सत्ता और रसूख के आगे सच को बार-बार दबाया गया? यही वजह है कि यह केस आज भी लोगों के ज़ेहन में एक अधूरा न्याय बनकर मौजूद है।
ताज़ा विवाद की जड़ एक वायरल वीडियो और कथित ऑडियो क्लिप हैं, जिनमें अभिनेत्री उर्मिला सनावर—जो बीजेपी से निष्कासित पूर्व विधायक सुरेश राठौर की कथित पत्नी बताई जा रही हैं—ने गंभीर दावे किए हैं। इन क्लिप्स में एक “VIP” का उल्लेख किया गया है, जिसे “गट्टू” कहा गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स और राजनीतिक चर्चाओं में इस नाम को बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव और उत्तराखंड प्रभारी दुष्यंत कुमार गौतम से जोड़ा गया है। इसके अलावा, कुछ जगहों पर आरती गौड़ (पूर्व जिला पंचायत सदस्य) का नाम भी सामने आया है, हालांकि पूरा फोकस मुख्य रूप से दुष्यंत गौतम पर केंद्रित रहा है। यह स्पष्ट करना ज़रूरी है कि ये सभी आरोप फिलहाल आरोप मात्र हैं, और इनकी सत्यता की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दुष्यंत कुमार गौतम ने इन आरोपों को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा है कि यह उनकी छवि खराब करने की साजिश है। उन्होंने कथित ऑडियो–वीडियो को फर्जी बताया है और इसे हटाने के साथ-साथ मानहानि का मुकदमा करने की चेतावनी भी दी है। दूसरी ओर, बीजेपी ने पूरे विवाद को कांग्रेस और विपक्ष की राजनीतिक साजिश करार दिया है। बावजूद इसके, यह सवाल लगातार उठ रहा है कि अगर आरोप झूठे हैं, तो स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच से परहेज़ क्यों?
राजनीतिक मोर्चे पर यह मामला अब खुली जंग में तब्दील हो चुका है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों का आरोप है कि VIP एंगल को शुरू से ही जांच के हाशिए पर रखा गया, ताकि बड़े नाम सामने न आएं। विपक्ष की मांग है कि पूरे मामले की CBI से जांच कराई जाए, जिससे किसी भी तरह के राजनीतिक दबाव या संदेह की गुंजाइश न रहे। इसी बीच, वायरल सामग्री को लेकर उर्मिला सनावर और सुरेश राठौर के खिलाफ FIR दर्ज होना यह दिखाता है कि मामला केवल बयानबाज़ी तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अब कानूनी दायरे में भी गंभीर रूप ले चुका है।
उत्तराखंड सरकार की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। सरकार यह कहती रही है कि मूल मामले में दोषियों—रिसॉर्ट मालिक पुलकित आर्य (निष्कासित बीजेपी नेता विनोद आर्य के बेटे) और उसके दो साथियों—को आजीवन कारावास की सजा मिल चुकी है। लेकिन आलोचकों का कहना है कि सिर्फ़ सजा देना पर्याप्त नहीं है, जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि क्या इस अपराध के पीछे कोई और प्रभावशाली चेहरा था। महिला संगठनों और नागरिक समाज का तर्क है कि जब तक हर संभावित पहलू—खासकर बीजेपी VIP एंगल—की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच नहीं होती, तब तक यह मामला अधूरा ही रहेगा।
इसी आक्रोश और असंतोष की पृष्ठभूमि में 4 जनवरी को देहरादून में बड़े विरोध प्रदर्शन का ऐलान किया गया है। अंकिता का परिवार, महिला संगठन, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और कई राजनीतिक दल इस प्रदर्शन में शामिल होने वाले हैं। उनका साफ़ कहना है—यह आंदोलन किसी एक पार्टी के खिलाफ़ नहीं, बल्कि न्याय की अधूरी प्रक्रिया और अनुत्तरित सवालों के खिलाफ़ है। “न्याय चाहिए, पूरा सच चाहिए” का नारा अब सड़कों से उठकर सत्ता के दरवाज़ों तक पहुंचने की तैयारी में है।
अंकिता भंडारी हत्याकांड आज भी एक ऐसा आईना है, जिसमें समाज, राजनीति और प्रशासन—तीनों को अपना चेहरा देखना होगा। सवाल यही है कि क्या 4 जनवरी का जनआक्रोश सत्ता को सच की ओर झुकाएगा, या यह मामला भी समय के साथ फाइलों में दबा दिया जाएगा? यह सिर्फ़ अंकिता के लिए न्याय की लड़ाई नहीं है, बल्कि हर उस बेटी के लिए है जो सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन का सपना लेकर घर से बाहर कदम रखती है।





