प्रो. शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 22 नवंबर 2025
बिहार चुनाव के नतीजों ने पूरे राज्य में जश्न का माहौल बना दिया है—राजनीतिक दलों के कार्यालयों में ढोल-नगाड़े, नेताओं की जीत के जुलूस, समर्थकों का उत्साह और टीवी चैनलों पर लगातार चलती ‘बहुमत’ की हेडलाइन्स। पर इस राजनीतिक उत्सव की चकाचौंध के पीछे एक ऐसी हकीकत छिपी है जो आने वाले वर्षों में बिहार की अर्थव्यवस्था की धड़कनों को कमजोर कर सकती है। यह सच यह बताता है कि राज्य ऐसे समय में कदम रख रहा है जहाँ वह “वेलफेयर पॉलिटिक्स” की चमकदार दुनिया से निकलकर “फिस्कल क्राइसिस” के दौर में प्रवेश कर रहा है। चुनावी वादों और कल्याणकारी घोषणाओं की बाढ़ ने राजनीति को तो चमका दिया, पर अब अर्थव्यवस्था उनकी कीमत वसूलने के लिए तैयार बैठी है। वोटरों को लक्षित लाभ, नकद सहायता और मुफ्त योजनाओं ने त्वरित प्रभाव पैदा किया—यह नीतियाँ लाखों लोगों तक पहुँचीं, उनकी भावनाओं को छुआ, और चुनावी समर्थन भी दिलाया। लेकिन इन सबकी आर्थिक कीमत, जो पहले धुँधली थी, अब धीरे–धीरे और तेज़ रौशनी में आ रही है, और ये आँकड़े जितने चौंकाने वाले हैं उतने ही चिंताजनक भी।
राजनीतिक दृष्टि से भी परिणामों में कई अनोखे और अनपेक्षित पहलू हैं। बड़े वोट प्रतिशत के बावजूद विपक्ष को कम सीटें मिलीं, जबकि सत्ता पक्ष ने लगभग बिना नुकसान के प्रभावशाली प्रदर्शन किया। असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM ने छह में से पाँच सीटें जीतकर चमत्कार किया और LJP–RV का एक सीट से 19 सीटों का छलाँग लगाना तो किसी “चुनावी परिघटना” से कम नहीं। इतना उलटफेर, इतना विचलन और इतना “चमत्कार”—ये सब इस चुनाव को राजनीतिक विज्ञान के शोध का विषय बनाते हैं। पर असली बड़ा सवाल अब सामने है—क्या यह विशाल जनादेश बिहार की अर्थव्यवस्था को समृद्ध करेगा या उसे कर्ज़ और वित्तीय असंतुलन की गहरी खाई की ओर धकेल देगा? शुरुआती अनुमान बताते हैं कि NDA की नई कल्याणकारी योजनाओं की कीमत अकेले 2025–26 में ही ₹40,000 करोड़ से ऊपर जा सकती है—जो बिहार की GDP का लगभग 4% है, और पाँच वर्षों में यह बोझ ₹2 लाख करोड़ तक पहुँच सकता है। ऐसे राज्य के लिए, जो पहले से ही सीमित आर्थिक संसाधनों पर चलता है, यह सिर्फ अतिरिक्त खर्च नहीं बल्कि विकास की रूपरेखा को बदल देने वाला बोझ है—एक ऐसा बोझ जो भविष्य के कई वित्तीय दरवाज़ों को बंद कर सकता है।
बिहार का सार्वजनिक कर्ज़ इस समय ₹4.06 लाख करोड़ के रिकॉर्ड स्तर पर है। इससे भी अधिक चिंताजनक यह है कि राज्य हर दिन ₹63 करोड़ सिर्फ ब्याज में चुका रहा है, यानी 2025–26 में कुल ₹23,014 करोड़। इसके साथ ही सरकार की नई उधारी योजना ₹32,918 करोड़ की है, जिससे कर्ज़–से–GDP अनुपात लगभग 40% तक पहुँच जाएगा—देश के सबसे ऊँचे अनुपातों में से एक। राज्य की पूँजी प्राप्ति का बड़ा हिस्सा अब कर्ज़ पर आधारित है। यह स्थिति उस समय और विरोधाभासी लगती है जब हम देखते हैं कि बिहार ने पिछले दशक में लगभग 11% की मजबूत nominal GDP growth दर्ज की है। लेकिन विकास की इस गति के साथ–साथ माइक्रोफाइनेंस कर्ज़ भी नई ऊँचाइयों को छू चुका है—मार्च 2025 तक छोटे कर्ज़ों का बकाया ₹57,712 करोड़ पहुँच गया है।
राजकोषीय लोकलुभावनवाद और बिहार का विशिष्ट संकट
देश भर में चुनावों का समीकरण अब welfare schemes के इर्द-गिर्द घूमता है। लेकिन बिहार की कहानी इसलिए अलग है क्योंकि इसकी आर्थिक आधारशिला बेहद कमजोर है—कम प्रति व्यक्ति आय, सीमित औद्योगिकीकरण, कृषि पर भारी निर्भरता, केंद्र से भारी वित्तीय सहायता पर राज्य की आर्थिक निर्भरता, और विशाल आबादी जो रोज़गार के लिए पलायन पर मजबूर है। ऐसी स्थिति में welfare एक सहारा बनता है—एक ऐसी राजनीति जो तत्काल राहत तो देती है, पर structural reforms को स्थगित कर देती है। महिलाओं को नकद सहायता, मुफ्त बिजली यूनिट्स, रोजगार भत्ता और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के विस्तार ने मतदाताओं को आकर्षित किया। लाखों के लिए यह योजनाएँ जीवन-सहायक थीं—क्योंकि राज्य में आय के स्थायी स्रोत बेहद सीमित हैं और सार्वजनिक सेवाएँ कमजोर हैं। लेकिन जब welfare अस्थायी सहारे से बदलकर स्थायी आवश्यकता बन जाता है, तो अर्थव्यवस्था की कमर टूटने लगती है—और सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बचती।
बजट का बढ़ता दबाव और घटती वित्तीय स्वतंत्रता
बिहार की वित्तीय संरचना वैसे ही बेहद सीमित है—राजस्व कमजोर, और पूँजीगत व्यय (सड़कें, बिजली, सिंचाई, इंफ्रास्ट्रक्चर) केंद्र की ग्रांट्स और बाहरी कर्ज़ पर निर्भर। यह भी उल्लेखनीय है कि जितना अधिक capital expenditure होता है, उतनी ही अधिक “अनौपचारिक” और “अनरिकॉर्डेड” खर्च की परतें भी छिपी रहती हैं। NDA शासन के दौरान बिहार को UPA के मुकाबले तीन गुना अधिक सहायता मिली—2004–14 के ₹2.8 लाख करोड़ की तुलना में 2014–24 में ₹9.23 लाख करोड़। लेकिन अब welfare पर ₹40,000 करोड़ का अतिरिक्त वार्षिक भार इस सहायता को भी अपर्याप्त बना देता है। इसे पूरा करने के लिए बिहार या तो और कर्ज़ लेगा, या पूँजीगत विकास कम करेगा, या केंद्र पर निर्भरता और बढ़ाएगा। तीनों रास्ते बिहार के दीर्घकालिक विकास के लिए हानिकारक हैं—कर्ज़ बढ़ने से ब्याज बोझ बढ़ेगा, कैपेक्स कम होने से नौकरियाँ घटेंगी और केंद्र पर निर्भरता बढ़ने से नीति-निर्माण की स्वतंत्रता खत्म होगी।
फ्रीबी ट्रैप: जहाँ राजनीति जीतती है, भविष्य हारता है
अर्थशास्त्री welfare को दो हिस्सों में बाँटते हैं—
(1) क्षमता बढ़ाने वाला welfare — जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, कौशल
(2) राजनीतिक लाभ दिलाने वाला welfare — नकद हस्तांतरण, मुफ्त सेवाएँ, सब्सिडी
बिहार के नए वादों में क्षमता निर्माण का हिस्सा कम है और राजनीतिक उपभोग का अनुपात कहीं अधिक। और जब welfare स्थायी बन जाए, पर अर्थव्यवस्था की उत्पादन क्षमता न बढ़े, तो राज्य “फ्रीबी ट्रैप” में फँस जाता है। इससे निजी निवेश घटता है, रोजगार के अवसर कम होते हैं, और घाटा बढ़ता जाता है। बिहार के लिए—जहाँ उद्योग, निवेश, मूल्य-श्रृंखला और रोजगार का संकट प्रमुख है—यह ट्रैप और भी खतरनाक है।
विकास की अवसर लागत: जो खो रहा है बिहार
बिहार की सबसे बड़ी समस्या हमेशा से यही रही है—राज्य में रोजगार कैसे पैदा हों ताकि लोग पलायन से बच सकें। NDA का 1 करोड़ नौकरियों का वादा बहुत बड़ा है, लेकिन यह तब ही संभव है जब राज्य में औद्योगिक भूमि, बिजली, आसान नियम, कृषि-प्रसंस्करण और PPP मॉडल को मजबूत किया जाए। लेकिन जब पैसा recurring welfare पर खर्च होता है, तो वही पैसा long-term reforms से काटा जाता है—वो सुधार जो असली विकास का आधार होते हैं। Welfare अल्पकालिक राहत देता है, लेकिन सुधार ही दीर्घकालिक समृद्धि दिलाते हैं। जब राजनीतिक प्रोत्साहन welfare को बढ़ावा देता है और संरचनात्मक सुधारों को पीछे धकेलता है, तो राज्य ठहर जाते हैं—और बिहार इस जोखिम के बीच खड़ा है।
भारत पर असर: बिहार सिर्फ बिहार नहीं, एक राष्ट्रीय आर्थिक चर
बिहार का आर्थिक स्वास्थ्य देश की अर्थव्यवस्था का एक बड़ा निर्धारक है। यहाँ की मंदी या संकट का असर राष्ट्रीय श्रम बाजार, प्रवास के पैटर्न, मांग, कृषि और केंद्र की वित्तीय नीतियों पर पड़ेगा। यदि बिहार fiscal overstretch में फँस गया, तो तीन बड़े राष्ट्रीय परिणाम सामने आएँगे—
- केंद्र पर वित्तीय दबाव बढ़ेगा
- विशाल युवा आबादी बेरोज़गार या कम-रोज़गार रह जाएगी
- अन्य राज्य भी competitive populism की दौड़ में उतर जाएँगे
यह केंद्र के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण स्थिति होगी—क्योंकि अत्यधिक सहायता देने से अन्य राज्यों को भी ‘कर्ज़ पे कल्याण’ मॉडल अपनाने का प्रोत्साहन मिलेगा।
बिहार के सामने रास्ता: वादा या विवेक?
राज्य अब एक निर्णायक मोड़ पर है। इसे welfare को तर्कसंगत बनाना होगा, राजस्व बढ़ाना होगा और पूँजीगत निवेश को प्राथमिकता देनी होगी। अगर ये काम नहीं हुआ, तो बिहार अपने ही चुनावी वादों के बोझ में दब सकता है। चुनावों में जीत आसान होती है, पर विकास की जीत बनाना कठिन होता है।
बिहार का यह चुनाव सिर्फ राजनीतिक नक्शा नहीं बदलता—यह एक भारी आर्थिक बज़न भी साथ लाता है। Welfare-driven politics वोट दिला सकती है, पर विकास नहीं। आने वाले पाँच साल तय करेंगे कि बिहार अपनी अर्थव्यवस्था को “फ्रीबी ट्रैप” से बाहर निकालता है या उसी दलदल में और गहराई तक उतर जाता है। और यह निर्णय सिर्फ बिहार का नहीं—पूरे देश की आर्थिक संरचना को प्रभावित करेगा।




