नई दिल्ली, 23 सितंबर 2025
शादी-शुदा जीवन के विवादों में बच्चे को ‘हथियार’ की तरह इस्तेमाल करना न केवल नैतिक रूप से गलत है, बल्कि यह मानसिक क्रूरता का गंभीर रूप भी माना जाएगा। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने ताज़ा फैसले में यही दोहराया और साफ कहा कि बच्चे को दूसरे अभिभावक से अलग कर देना उसके भावनात्मक अधिकारों और रिश्तों पर गहरी चोट है। अदालत ने इस टिप्पणी के साथ उस महिला की अपील खारिज कर दी, जिसने फैमिली कोर्ट के तलाक संबंधी आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखते हुए स्पष्ट किया कि पति को तलाक देने का आधार उचित और न्यायसंगत है।
मामला एक ऐसे दंपति का है जिनका विवाह 1990 में हुआ था। कुछ वर्षों बाद दोनों के रिश्तों में दरार आई और पत्नी 2008 से अलग रहने लगी। पति ने आरोप लगाया कि पत्नी ने जानबूझकर बेटे को उससे मिलने नहीं दिया और अदालत के आदेश के बावजूद पिता-पुत्र का रिश्ता तोड़ दिया गया। पति ने 2009 में तलाक की अर्जी दी थी और 2021 में फैमिली कोर्ट ने इसे स्वीकार कर लिया। पत्नी ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच—न्यायमूर्ति अंकिल खेतरपाल और न्यायमूर्ति हरीश वैद्यानाथन शंकर—ने कहा कि बच्चे को जानबूझकर एक अभिभावक से दूर रखना उस अभिभावक के मानसिक स्वास्थ्य और भावनात्मक स्थिति पर गहरी चोट है। अदालत ने कहा कि “बच्चे को हथियार की तरह प्रयोग करना विवाह की नींव को तोड़ देता है और इसे मानसिक क्रूरता माना जाएगा।”
न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि वैवाहिक संबंध केवल नाम मात्र का नहीं होता, बल्कि उसमें सहजीवन, आपसी सम्मान और बच्चों की भलाई की जिम्मेदारी शामिल है। जब यह सब स्थायी रूप से समाप्त हो जाए, तो विवाह का टूटना स्वाभाविक है।
इस फैसले का महत्व यह है कि अदालतों ने बच्चों को marital disputes में केंद्र बिंदु बनाने पर सख्त रुख दिखाया है। यह संदेश भी दिया गया है कि पति-पत्नी के बीच कितनी भी कटुता हो, बच्चों को बीच में लाना न केवल बच्चे के हित के खिलाफ है बल्कि कानूनन भी अमान्य है।
दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला इस बात को रेखांकित करता है कि बच्चे माता-पिता के झगड़े का ‘मोरचा’ नहीं हैं। उन्हें अलग-थलग करना न केवल उनके भविष्य से खिलवाड़ है बल्कि इसे तलाक मामलों में मानसिक क्रूरता का ठोस आधार भी माना जाएगा।




