एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 14 मार्च 2026
मध्य पूर्व में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा पर भी दिखाई देने लगा है। विशेषज्ञों का कहना है कि ऊर्जा और उर्वरकों की कीमतों में तेजी आने से दुनिया भर में खाद्य पदार्थों की महंगाई बढ़ सकती है और कई देशों में खेती की लागत भी बढ़ने वाली है।
दुनिया की बड़ी मात्रा में ऊर्जा आपूर्ति Strait of Hormuz यानी होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरती है। ईरान और ओमान के बीच स्थित इस संकरे समुद्री मार्ग से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और एलएनजी भेजा जाता है। युद्ध और हमलों की घटनाओं के कारण यहां से गुजरने वाले जहाजों की आवाजाही प्रभावित होने लगी है, जिससे वैश्विक बाजार में चिंता बढ़ गई है।
खाद की आपूर्ति पर खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार संकट सिर्फ तेल तक सीमित नहीं है, बल्कि खेती के लिए जरूरी उर्वरकों की आपूर्ति भी प्रभावित हो सकती है। अमोनिया, फॉस्फेट और सल्फर जैसे कई प्रमुख उर्वरकों का लगभग 20 प्रतिशत उत्पादन खाड़ी क्षेत्र से आता है।
रिपोर्टों के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली नाइट्रोजन खाद यूरिया का करीब आधा व्यापार भी इसी क्षेत्र से जुड़ा है। इसमें अकेले कतर की हिस्सेदारी लगभग 10 प्रतिशत है। कतर के बड़े एलएनजी और उर्वरक केंद्र Ras Laffan Industrial City पर हमले के बाद उत्पादन अस्थायी रूप से रोकना पड़ा, जिससे लाखों टन उर्वरक की आपूर्ति प्रभावित हुई है।
खेती की लागत बढ़ने की आशंका
विशेषज्ञों का कहना है कि उर्वरक महंगे होने से किसानों की लागत तेजी से बढ़ेगी। ऐसी स्थिति में किसान उन फसलों की खेती को प्राथमिकता दे सकते हैं जिनमें कम खाद की जरूरत होती है। इसका असर गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की पैदावार पर पड़ सकता है।
कृषि अर्थशास्त्रियों के मुताबिक अगर उर्वरकों की कीमतें लगातार बढ़ती रहीं तो गरीब और विकासशील देशों के किसान पर्याप्त खाद नहीं खरीद पाएंगे, जिससे उत्पादन में गिरावट की आशंका है।
तेल की कीमतों से बढ़ेगी खाद्य महंगाई
युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में भी तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में Brent Crude की कीमत हाल ही में 119 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी और फिलहाल लगभग 89 डॉलर के आसपास बनी हुई है।
तेल की कीमत बढ़ने का असर केवल ईंधन तक सीमित नहीं रहता। खेती में इस्तेमाल होने वाली मशीनों, परिवहन, खाद्य प्रसंस्करण और कोल्ड स्टोरेज तक हर क्षेत्र ऊर्जा पर निर्भर है। इसलिए ऊर्जा महंगी होने से खाद्य पदार्थों की कीमतें भी बढ़ने लगती हैं।
भारत समेत कई देशों पर असर
भारत, ब्राजील और दक्षिण एशिया के कई देश उर्वरकों के आयात पर काफी हद तक निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत की नाइट्रोजन आधारित खाद का बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से मंगाता है। यदि आपूर्ति बाधित होती है तो आने वाले मानसून सीजन में बुवाई की लागत बढ़ सकती है।
आयात पर निर्भर गरीब देशों के लिए यह संकट और गंभीर हो सकता है। अगर उर्वरक और ऊर्जा की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो कई क्षेत्रों में खाद्य संकट और भुखमरी का खतरा भी बढ़ सकता है। यदि मध्य पूर्व में तनाव जल्द खत्म नहीं हुआ तो इसका असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की खाद्य सुरक्षा, खेती और महंगाई पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है।




