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जिनेवा में अमेरिका-ईरान की अप्रत्यक्ष वार्ता, परमाणु गतिरोध तोड़ने की कवायद

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एबीसी नेशनल न्यूज | जिनेवा | 17 फरवरी 2026

स्विट्जरलैंड के जिनेवा में अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चले आ रहे परमाणु विवाद को सुलझाने के उद्देश्य से 17 फरवरी को अप्रत्यक्ष वार्ता आयोजित की गई। दोनों देशों के प्रतिनिधि एक ही शहर में मौजूद रहे, लेकिन आमने-सामने बैठने के बजाय बातचीत मध्यस्थों के जरिए आगे बढ़ाई गई। कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, बैठक का माहौल औपचारिक और सतर्क रहा तथा फिलहाल किसी बड़े समझौते या ठोस प्रगति के स्पष्ट संकेत सामने नहीं आए हैं।

वार्ता का केंद्र बिंदु ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ते अंतरराष्ट्रीय तनाव को कम करना और संभावित नए समझौते की रूपरेखा तैयार करना था। अमेरिकी पक्ष चाहता है कि ईरान उच्च स्तर के यूरेनियम संवर्धन पर रोक लगाए, अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षण को पूरी तरह बहाल करे और पारदर्शिता सुनिश्चित करे। दूसरी ओर, तेहरान का कहना है कि जब तक उस पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों में वास्तविक और प्रभावी राहत नहीं दी जाती, तब तक किसी भी नए समझौते पर आगे बढ़ना संभव नहीं है।

यह कूटनीतिक पहल ऐसे समय में हो रही है जब वॉशिंगटन ने पश्चिम एशिया में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है। अमेरिकी नौसेना के युद्धपोतों और अतिरिक्त सैन्य संसाधनों की तैनाती को कई विश्लेषक दबाव की रणनीति के रूप में देख रहे हैं। हालांकि अमेरिका का आधिकारिक रुख है कि यह कदम क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने और अपने सहयोगियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया है।

ईरान ने इस सैन्य गतिविधि पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि किसी भी प्रकार का दबाव या शक्ति प्रदर्शन वार्ता के माहौल को प्रभावित कर सकता है। ईरानी अधिकारियों ने दोहराया है कि वे कूटनीतिक समाधान के पक्षधर हैं, लेकिन राष्ट्रीय संप्रभुता और सुरक्षा से समझौता नहीं करेंगे।

पृष्ठभूमि में 2015 का परमाणु समझौता (JCPOA) अहम है, जिसके तहत ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं स्वीकार की थीं और बदले में प्रतिबंधों में राहत मिली थी। 2018 में अमेरिका के समझौते से बाहर होने और प्रतिबंधों की पुनर्बहाली के बाद दोनों देशों के संबंधों में तीखा तनाव लौट आया। तब से कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल सका है।

विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों पक्ष फिलहाल अधिकतम दबाव और अधिकतम मांग की रणनीति पर कायम हैं, जिससे त्वरित समाधान की संभावना सीमित दिखाई देती है। फिर भी, जिनेवा में संवाद की यह बहाली इस बात का संकेत है कि दोनों देश पूरी तरह टकराव की राह पर नहीं जाना चाहते। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह कूटनीतिक प्रयास किसी ठोस समझौते का रूप लेता है या परमाणु विवाद का यह गतिरोध आगे भी बना रहता है।

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