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UN ने दिया भारत को वैश्विक सम्मान: मुरलीधर बने चेयर, जिन्हें देश में SC से रोका गया था

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आलोक कुमार। नई दिल्ली 29 नवंबर 2025

पूर्व ओडिशा हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. एस. मुरलीधर को संयुक्त राष्ट्र ने एक बड़ी जिम्मेदारी देते हुए UN कमिशन ऑफ इंक्वायरी (Independent International Commission of Inquiry on the Occupied Palestinian Territory, including East Jerusalem, and Israel) का चेयर नियुक्त किया गया है।

अधिकृत फ़िलिस्तीनी क्षेत्र, जिसमें पूर्वी यरूशलम और इज़राइल शामिल हैं, पर संयुक्त राष्ट्र की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जाँच आयोग दुनिया के सबसे संवेदनशील भू-राजनीतिक क्षेत्रों में मानवाधिकार उल्लंघनों, युद्ध अपराधों और अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के उल्लंघन की निगरानी करता है। इस प्रतिष्ठित पद पर किसी भारतीय न्यायविद का चुना जाना अपने आप में एक अंतरराष्ट्रीय मान्यता है और यह बताता है कि डॉ. मुरलीधर की न्यायिक दृष्टि और ईमानदारी को विश्व समुदाय कितना उच्च दर्जा देता है।

भारत में जिन परिस्थितियों में उन्हें हाशिये पर धकेला गया, वह भी इस नियुक्ति को और महत्वपूर्ण बनाता है। भारत के एक जज, जिन्हें अपने देश में रोक दिया गया, आज संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय न्याय की कमान संभालेंगे—यह इतिहास का सबसे सुंदर और शक्तिशाली उत्तर है।

डॉ. मुरलीधर उन गिने-चुने भारतीय जजों में शामिल रहे हैं जिन्होंने सत्ता या राजनीतिक दबाव की परवाह किए बिना निडर होकर फैसले सुनाए। दिल्ली दंगों के दौरान भड़काऊ भाषणों को लेकर केंद्र सरकार के मंत्रियों पर सवाल उठाना और आधी रात को दंगाग्रस्त इलाकों में घायलों को तत्काल मेडिकल सहायता दिलाने का आदेश—इन फैसलों ने उन्हें जनता का सम्मान दिलाया लेकिन सत्ता को असहज कर दिया। इसी के बाद अचानक उनका तबादला कर दिया गया। यही नहीं, योग्यतम जजों में से एक माने जाने के बावजूद उन्हें सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुँचने दिया गया।

कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि उनके साहसी फैसलों और राजनीतिक नेतृत्व से टकराव के कारण उन्हें सर्वोच्च न्यायालय जाने से रोका गया। इसे एक “बदले की भावना वाली सरकार” और “दबाव में झुकते हुए कोलेजियम” की संयुक्त भूमिका बताया गया। प्रश्न यह भी उठा कि क्या भारत की न्यायपालिका सच में स्वतंत्र है, यदि एक उत्कृष्ट, ईमानदार और कानून के प्रति समर्पित जज को सत्ता बदलने के डर से सुप्रीम कोर्ट की कुर्सी से दूर कर दिया जाए?

ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र का यह भरोसा उनके न्यायिक चरित्र पर गहरा विश्वास दर्शाता है। UN की यह नियुक्ति साफ साबित करती है कि न्याय और मानवाधिकार के क्षेत्र में डॉ. मुरलीधर की विशेषज्ञता, निष्पक्षता और नैतिक बल को वैश्विक मंच पर सर्वोच्च दर्जा दिया जाता है। यह भारत के लिए भी गर्व का अवसर है, भले ही अपने ही देश में उन्हें वह सम्मान न मिला हो जिसके वे हकदार थे। दुनिया ने उनकी क्षमता को पहचाना और अब उन्हें एक ऐसे कमिशन की अगुवाई सौंपी है, जो वैश्विक राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाता है।

यह नियुक्ति भारत की न्यायिक चेतना और लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए एक संदेश भी है। यह बताती है कि यदि एक जज अपने काम, सिद्धांत और साहस से समझौता नहीं करता, तो उसे पहचानने वाले हाथ कहीं न कहीं ज़रूर मिलते हैं—भले ही अपने देश की राजनीतिक परिस्थितियाँ उसे दबाने की कोशिश करें। डॉ. मुरलीधर की यह उपलब्धि उस सोच पर भी करारा तमाचा है जो स्वतंत्र न्यायपालिका को कमजोर करने का प्रयास करती है। यह सम्मान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि उस न्यायिक नैतिकता का है जिसकी आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता है।

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