बिहार चुनाव 2025 के ओपिनियन और एग्ज़िट पोल आते ही एक बार फिर वही बहस लौट आई है—क्या ये आंकड़े भरोसेमंद हैं? क्या ये वाकई जनता की नब्ज़ पकड़ते हैं या सिर्फ सत्ता-समर्थित नैरेटिव को आगे बढ़ाते हैं? लगभग हर एजेंसी ने NDA को 130 से 167 सीटों तक की भारी जीत का अनुमान दिया है, जबकि तेजस्वी यादव की तूफानी रैलियाँ, भीड़ का सैलाब, युवाओं का जोश और महंगाई-बेरोज़गारी पर गुस्सा—इन सबका कहीं भी कोई प्रतिबिंब दिखाई नहीं दे रहा। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या बिहार की जमीन पर जो दिख रहा था, उसे सर्वे करने वाले देख नहीं पाए या देखना नहीं चाहते थे? क्या यह सिर्फ डेटा नहीं, बल्कि दबावों, झुकावों और तयशुदा निष्कर्षों का खेल है?
तेजस्वी यादव की रैलियों में उमड़ी भारी भीड़ ने इस चुनाव की सबसे ताकतवर तस्वीरें पेश कीं। युवाओं, गरीबों और महिलाओं का बड़ा हिस्सा खुले तौर पर बदलाव की बात करता दिखा। लेकिन एग्ज़िट पोल कहते हैं कि यह भीड़ वोट में तब्दील नहीं हुई। क्या यह संभव है कि लाखों लोगों की भीड़ वास्तव में वोट डालने नहीं पहुँची? या यह भीड़ पोल करने वालों के सर्वे में दर्ज ही नहीं हुई? बिहार में लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि पोल एजेंसियाँ कहीं न कहीं ‘मूड सेट करने’ का काम करती हैं—मतदाताओं के मन में यह संदेश डालने के लिए कि NDA जीत रहा है, इसलिए उसी ओर झुकाव रखना चाहिए। राजनीति में यह रणनीति पुरानी है—भीड़ हार सकती है, लेकिन नैरेटिव कभी हारने नहीं दिया जाता।
महिला मतदाताओं के वोट को लेकर एग्ज़िट पोल ने फिर वही पुरानी कहानी दोहराई—कि महिलाएँ NDA को भारी समर्थन दे रही हैं। सवाल यह है कि यह निष्कर्ष सर्वेक्षण से आया या यह मान्यता पहले से ही तय थी? क्योंकि महिलाओं की वास्तविक समस्याएँ—महंगाई, दवा-इलाज का खर्च, बच्चों का भविष्य, किचन का बजट—इन सब पर महागठबंधन का मुद्दा ज्यादा प्रभावशाली माना जा रहा था। लेकिन पोल्स में यह सब गायब है। दूसरी तरफ बीजेपी–JDU का यह तर्क कि ‘महिलाएँ 10–10 रुपये लेकर वोट देती हैं’, बिहार की महिलाओं का अपमान भी है और एक मनोवैज्ञानिक चित्रण भी—जिसका इस्तेमाल वोटर व्यवहार को एक दिशा में ढालने के लिए किया जा सकता है। क्या वास्तव में गरीब महिलाएँ इतने छोटे लालच में अपनी राजनीतिक समझ खो देती हैं? कई राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं कि यह धारणा ही गलत है और यह सिर्फ लोगों के मन में एक कहानी गढ़ने का प्रयास है ताकि चुनाव परिणाम पहले से तय लगें।
एक और बड़ा सवाल है—क्या इन पोल्स को किसी ऊपरी दबाव में तैयार किया गया है? भारत में मीडिया और सर्वेक्षण संस्थाओं पर राजनीतिक-आर्थिक दबाव कोई नई बात नहीं। जब परिणाम एक जैसे हों, निष्कर्ष समान हों, और सभी पोल्स एक ही दिशा में इशारा करें, तो शंका स्वाभाविक है। क्या यह महज एक संयोग है कि हर एजेंसी NDA की बड़ी जीत का अनुमान लगा रही है? या फिर यह एक बहुस्तरीय राजनीतिक प्रबंधन है जिसमें डेटा का इस्तेमाल चुनावी रणनीति को मजबूत करने के लिए किया जाता है? विपक्ष के कई नेता पहले ही कह चुके हैं कि चुनाव आयोग से लेकर मीडिया, सर्वे और प्रशासन—सब पर दबाव के संकेत हैं। ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या ओपिनियन पोल वाकई ‘मतदाता की राय’ हैं या ‘राजनीतिक इच्छा’?
महागठबंधन में सीट बंटवारे में देरी ने भी उसके लिए बड़ा नुकसान खड़ा किया। कई स्थानीय समीकरण बिगड़ गए, कार्यकर्ता भ्रमित रहे, और गठबंधन की एकता पर सवाल उठे। क्या यह देरी महागठबंधन के खिलाफ गई? बहुत संभव है। लेकिन क्या यही महागठबंधन की हार की एकमात्र वजह है? पोल्स इसे मुख्य कारण बना रहे हैं, लेकिन क्या यह पूरा सच है? तेजस्वी यादव की लोकप्रियता और रैलियों की ताकत बताती है कि लोग बदलाव की ओर आकर्षित थे—तो फिर पोल्स में यह बदलाव क्यों नहीं दिखा? क्या महागठबंधन के अन्य दल—जैसे कांग्रेस, वाम दल, HAM, VIP—तेजस्वी के कंधे पर बोझ बन गए? यह भी एक महत्वपूर्ण सवाल है, जिसे पोल्स ने लगभग अनदेखा कर दिया।
और सबसे बड़ा सवाल—क्या बिहार फिर एक बार पुराने ‘जंगलराज’ बनाम ‘सुशासन’ के नैरेटिव में फंस गया? नीतीश कुमार की छवि अब पहले जैसी चमकदार नहीं रही, बीजेपी खुद कई बार उन्हें अस्थिर और अविश्वसनीय कह चुकी है। फिर भी पोल्स कहते हैं कि बिहार को नीतीश में ही भरोसा दिख रहा है। क्या यह राजनीतिक तर्क वास्तविकता से मेल खाता है? या यह वही कहानी है जो हर चुनाव में दोहराई जाती है ताकि मतदाता के दिमाग में एक साफ-सुथरी तस्वीर बैठाई जा सके?
ओपिनियन पोल इस बार सिर्फ आंकड़ों का मसला नहीं हैं—वे मनोवैज्ञानिक हथियार भी हैं। वे जनता को यह जताने का तरीका हैं कि परिणाम तय है, लड़ाई खत्म है, और जनता को वही रास्ता चुनना चाहिए जिसे शक्तिशाली समूह चुनना चाहता है। लेकिन बिहार की राजनीति हमेशा अप्रत्याशित रही है—और इतिहास गवाह है कि हवा आखिरी क्षण तक बदल सकती है, ठहर सकती है, उलट सकती है।
अब 14 नवंबर की गिनती बताएगी कि सच में जनता ने क्या फैसला किया—क्या पोल्स सही थे, या फिर यह भी एक बार बिहार ने खुद को चौंकाने का मौका दिया है।




