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ट्रंप की गरज, मोदी की चुप्पी — क्या भारत की विदेश नीति घुटनों पर?

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अंतरराष्ट्रीय ब्यूरो 3 नवंबर 2025

डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में एक बार फिर दावा किया कि उन्होंने ही भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध को टालकर पूरी दुनिया को बचाया। यह कोई पहली बार नहीं था — ट्रंप अब तक करीब 60 बार अलग-अलग मुद्दों पर भारत को सीधे घेरते हुए बयान दे चुके हैं, कभी कश्मीर पर मध्यस्थता का दावा, कभी भारत को टैरिफ चोर कहना, तो कभी भारतीय नेतृत्व को अंतरराष्ट्रीय मंच पर कमजोर सिद्ध करने की कोशिश। लेकिन इन सबके बीच हैरान करने वाली बात यह है कि नरेंद्र मोदी सरकार की चुप्पी हर बार कायम रही। न कोई जवाब, न कोई विरोध, न कोई सफाई — मानो भारत की विदेश नीति अब “मौन कूटनीति” पर टिकी हो, जो दुनिया में देश की प्रतिष्ठा को बचाने की बजाय उसे कमजोर बना रही है।

विपक्ष लगातार सवाल कर रहा है कि प्रधानमंत्री आखिर किस बात से डरते हैं? क्यों वह उन वैश्विक बैठकों से बचते नज़र आते हैं, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति भी शामिल होते हैं और विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों को एक मंच पर अपनी आवाज़ उठानी होती है? आलोचकों का कहना है कि ट्रंप से नज़र मिलाने की हिम्मत खो चुके मोदी अब उन कार्यक्रमों में जाना ही टाल रहे हैं, जहां मुश्किल सवाल उठ सकते हैं — चाहे वह चीन से तनाव पर अमेरिकी रवैया हो, या अंतरराष्ट्रीय व्यापार विवादों में भारत का अपमानजनक किरदार। यह स्थिति भारत जैसे उभरते महाशक्ति की विदेश नीति के लिए निश्चित ही शर्मनाक मानी जा रही है।

मोदी सरकार की आर्थिक और वैश्विक विश्वसनीयता को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब भारतीय उद्योगपति और सरकार के बेहद करीबी माने जाने वाले गौतम अडानी अमेरिकी अदालतों में रिश्वतखोरी और आर्थिक अनियमितताओं से जुड़े गंभीर आरोपों का सामना कर रहे हैं। विपक्ष आरोप लगाता है कि मोदी सरकार ने देश की नीतियों को एक व्यक्ति और एक कॉर्पोरेट समूह के हित में ढालकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को जोखिम में डाल दिया है। अब जब वही “दुनिया के तीसरे अमीर” माने जाने वाले उद्योगपति अंतरराष्ट्रीय जांच के घेरे में हैं, तो विदेशी निवेशकों के भरोसे पर भी बुरा असर पड़ा है। सवाल उठता है—क्या यह वही “विश्वगुरु भारत” है जिसकी कल्पना जनता को दिखाकर वोट मांगे गए थे?

भारतीय विदेश नीति का मूल सिद्धांत हमेशा से दृढ़ता, स्वाभिमान और समानता आधारित संवाद रहा है। लेकिन वर्तमान स्थिति में ऐसा प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री की छवि-सुरक्षा और राजनीतिक रणनीति देश की अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं पर हावी हो चुकी है। जब कोई वैश्विक नेता लगातार भारत पर टिप्पणी कर रहा हो और भारत का प्रधानमंत्री केवल मुस्कान और मौन से जवाब देता रहे — तो यह केवल कूटनीति की कमजोरी नहीं, बल्कि नेतृत्व के आत्मविश्वास पर बड़ा सवाल है।

विपक्ष का आरोप और भी तीखा है—“डरपोक तानाशाह” अब लोकतांत्रिक संस्थाओं से लेकर वैश्विक पहलकदमियों से भागता नजर आ रहा है। हवाहवाई दावों और इवेंट मैनेजमेंट की चमक के पर्दे के पीछे देश की साख फिसल रही है, लेकिन सत्ता का अहंकार इसे स्वीकार करने से इनकार कर रहा है। देश पूछ रहा है — जब दुनिया भारत के बारे में बात करती है, तो भारत का प्रधानमंत्री चुप क्यों है? क्या “56 इंच का सीना” अब अमेरिकी ताकत के सामने सिकुड़ गया है?

ये सवाल सिर्फ राजनीतिक नहीं — भारत के राष्ट्रीय सम्मान और वैश्विक नेतृत्व की भूमिका से जुड़े हैं। और इनका जवाब इतिहास मांगता है, जनता मांगती है — लेकिन मोदी सरकार की चुप्पी अभी भी टूटी नहीं है।

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