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ट्रंप की नीतियों ने अमेरिकी लोगों पर थोप दी जंग : ईरानी विदेश मंत्री अरागची

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अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/तेहरान | 19 मार्च 2026

अमेरिका, इज़राइल और ईरान के बीच जारी तनाव अब एक गंभीर और खतरनाक मोड़ पर पहुंच गया है। हालात तेजी से खुले टकराव की ओर बढ़ रहे हैं, जिससे पूरे पश्चिम एशिया में अस्थिरता का माहौल बन गया है। इसी बीच ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने अमेरिकी नेतृत्व, खासकर पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर तीखा हमला बोलते हुए कहा है कि यह युद्ध केवल ईरान पर थोपा गया संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका बोझ अब अमेरिकी जनता पर भी डाला जा रहा है। उनके इस बयान ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।

अरागची ने कहा कि अमेरिका की आक्रामक और हस्तक्षेपकारी नीतियों ने पूरे क्षेत्र को संकट में डाल दिया है। उनके मुताबिक, यह लड़ाई ईरान की इच्छा या पहल का परिणाम नहीं है, बल्कि अमेरिका और उसके सहयोगियों की रणनीतिक नीतियों का नतीजा है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “इस जंग की कीमत आम अमेरिकी नागरिक चुका रहे हैं, जिन्हें शायद यह भी पूरी तरह नहीं बताया जा रहा कि यह संघर्ष किन कारणों से और किसके हित में लड़ा जा रहा है।”

ईरानी विदेश मंत्री ने अमेरिका पर आरोप लगाया कि वह इज़राइल के हितों को सर्वोपरि रखते हुए क्षेत्रीय संतुलन को बिगाड़ रहा है। उन्होंने इसे “इज़राइल फर्स्ट” नीति करार दिया और कहा कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे का उपयोग एक ऐसे युद्ध में किया जा रहा है, जिसका सीधा संबंध अमेरिका की आंतरिक सुरक्षा से नहीं है। उनके अनुसार, इस नीति ने न केवल तनाव को बढ़ाया है, बल्कि शांति की संभावनाओं को भी कमजोर किया है।

वर्तमान हालात पर नजर डालें तो पिछले कुछ दिनों में सैन्य गतिविधियां तेज हुई हैं। अमेरिका और इज़राइल की ओर से ईरान समर्थित ठिकानों पर हमलों की खबरें सामने आई हैं, जिसके जवाब में ईरान ने भी सख्त रुख अपनाते हुए जवाबी कार्रवाई की है। इस पूरे घटनाक्रम ने खाड़ी क्षेत्र में अस्थिरता को चरम पर पहुंचा दिया है, जहां हर पल हालात और बिगड़ने का खतरा बना हुआ है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष अब सीमित दायरे से बाहर निकल चुका है और इसका असर वैश्विक स्तर पर देखने को मिल सकता है। ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर इसका सीधा प्रभाव पड़ सकता है। खासकर तेल की कीमतों में संभावित उछाल और महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों पर खतरे ने कई देशों की चिंता बढ़ा दी है।

अरागची ने युद्धविराम के सवाल पर भी अपना रुख स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि ईरान किसी अस्थायी “सीजफायर” के पक्ष में नहीं है, क्योंकि इससे समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। उनके अनुसार, “जरूरी है कि इस संघर्ष को जड़ से समाप्त किया जाए, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो और क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित हो सके।”

दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिकी कार्रवाई का बचाव करते हुए कहा है कि अमेरिका के कदम राष्ट्रीय हित और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए उठाए गए हैं। उन्होंने दावा किया कि इन कार्रवाइयों से ईरान की सैन्य क्षमताओं को नुकसान पहुंचा है और इससे क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने में मदद मिलेगी।

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस बढ़ते टकराव को लेकर गंभीर चिंता जता रहा है। संयुक्त राष्ट्र सहित कई देशों ने सभी पक्षों से संयम बरतने और कूटनीतिक समाधान खोजने की अपील की है। यूरोपीय देशों का मानना है कि यदि जल्द ही हालात को नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह संघर्ष एक बड़े क्षेत्रीय युद्ध का रूप ले सकता है, जिसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ेगा।

भारत जैसे देश भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, क्योंकि पश्चिम एशिया में अस्थिरता का सीधा असर ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक संतुलन पर पड़ता है। साथ ही, वहां रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा भी एक अहम मुद्दा बन गई है।

अमेरिका-इज़राइल-ईरान के बीच बढ़ता यह टकराव अब केवल एक क्षेत्रीय विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह वैश्विक शांति और स्थिरता के लिए एक गंभीर चुनौती बन चुका है। आने वाले समय में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि क्या कूटनीति इस बढ़ती आग को शांत कर पाएगी या फिर दुनिया एक बड़े और व्यापक संघर्ष की ओर बढ़ेगी।

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