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ट्रंप का नया धमाका : “भारत ने खुद ही कहा—नो टैरिफ”

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वाशिंगटन 3 सितम्बर 2025

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर से अपने विवादित तेवरों के साथ सामने आए हैं। इस बार उनका निशाना व्यापार और शुल्क नीति पर है। ट्रंप ने गर्व से दावा किया है कि जब अमेरिका ने भारत पर 50 प्रतिशत का भारी शुल्क लगाया, तो भारत घुटनों के बल झुक गया और ‘नो टैरिफ डील’ की पेशकश करनी पड़ी। यह बयान सिर्फ कूटनीतिक हलकों में सनसनी नहीं फैला रहा है, बल्कि यही जता रहा है कि अमेरिकी राजनीति में ट्रंप का अंदाज़ अब भी पहले जितना आक्रामक और चुनौतीपूर्ण है।

“भारत ने समझौता करना पड़ा था, क्योंकि हमने सख्ती दिखाई”

ट्रंप के मुताबिक, उनकी सरकार ने जो कदम उठाए, उसने भारत सहित दुनिया की कई ताक़तों को हिला कर रख दिया। ट्रंप अब खुलेआम कह रहे हैं कि भारत पहले खुद अमेरिकी सामान पर ऊंचे-ऊंचे टैरिफ लगाकर बैठा था, लेकिन जब उन्होंने 50% ड्यूटी ठोंकी, तब भारत को खुद ‘जीरो टैरिफ डील’ का विकल्प पेश करना पड़ा।

यह दावा सिर्फ व्यापारिक नीति का बयान नहीं है, बल्कि ट्रंप का अंदाज बताता है कि वह हमेशा कूटनीतिक रिश्तों को टकराव और ताक़त के दम पर देखने की आदत रखते हैं। उनका यह बयान दुनियाभर को यह संदेश देने वाला है कि ट्रंप जब भी सत्ता में रहते हैं, तो उनका इकोनॉमिक नेशनलिज्म किसी भी तरह का बैकफुट नहीं जानता।

आक्रामक ट्रंप का दोहराव—”सख़्ती ही असली ताक़त”

यह पहली बार नहीं है कि ट्रंप ने भारत और शुल्क नीतियों को लेकर किसी तरह का हमला बोला हो। उनकी हमेशा से यही रणनीति रही है कि जहां अमेरिका को नुकसान लगे, वहां तुरंत कर दो ‘टैरिफ अटैक’। ट्रंप के इस बयान के बाद माना जा रहा है कि यदि वह दोबारा सत्ता में आते हैं, तो अमेरिका और भारत के बीच व्यापारिक रिश्ते किसी नरमी के बजाय और ज्यादा टकराव और मोल-भाव की राजनीति का मैदान बनेंगे। स्पष्ट है कि ट्रंप अब भी यही संदेश देना चाहते हैं—अमेरिका की शर्तें मानो या फिर भुगतो भारी कीमत।

भारत के लिए क्या मतलब है यह बयान?

ट्रंप का यह दावा भारत के लिए गंभीर संदेश है। एक ओर देश लगातार वैश्विक स्तर पर निवेशक-हितैषी छवि बनाने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर ट्रंप जैसे बयानों से यह खतरा मंडराता है कि अगली अमेरिकी सरकार भारत पर फिर से हंटर चला सकती है।

यदि ट्रंप की बात सच है, तो यह साफ है कि भारत को ट्रंप की टैरिफ पॉलिटिक्स के आगे अपने बाजार और कूटनीति दोनों पर रणनीतिक चाल चलनी पड़ी थी। और यदि यह सिर्फ चुनावी बयानबाज़ी है, तो यह इस बात का साफ संकेत है कि ट्रंप भारतीय राजनीति को भी अपने चुनावी गणित का हिस्सा बनाने में पीछे नहीं हैं।

 

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