प्रो. शिवाजी सरकार, राजनीतिक विशेषज्ञ | नई दिल्ली 6 दिसंबर 2025
दुनिया की राजनीति में जो हलचल चल रही है, उसका सीधा असर भारत की अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है। रुपये की गिरती क़ीमत पहले ही संकेत दे रही है कि आम आदमी की जेब पर बड़ा बोझ आने वाला है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल सस्ता क्यों न हो जाए, लेकिन डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी पेट्रोल–डीज़ल को महंगा कर सकती है। ऐसे समय में सवाल उठता है कि क्या रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत यात्रा इस संकट को थोड़ा भी कम कर पाएगी? सच तो यह है कि यह यात्रा कई क्षेत्रों में मददगार हो सकती है, लेकिन तेल संकट को हल करने की उम्मीद कम है, क्योंकि भारत ने पहले ही रूसी तेल की खरीद को तेज़ी से कम करने का फैसला लिया है।
भारत ने जब रूस से सस्ता तेल खरीदना शुरू किया था, तब आम लोगों को लगा था कि इससे ईंधन की कीमतें घटेंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। असल में फायदा केवल दो कंपनियों को हुआ—एक भारतीय और एक रूसी। उनके मुनाफ़े बढ़े, लेकिन आम आदमी और सरकार को तेल महंगा ही खरीदना पड़ा। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों ने भी भारत–रूस व्यापार पर लगातार दबाव बनाया। उन्होंने भारत पर दंडात्मक शुल्क लगाए और हर कदम पर रूस से भारत की बढ़ती नज़दीकी पर निगरानी रखी। यहाँ तक कि खबरें यह भी आईं कि पुतिन का विमान, जब भारत के लिए उड़ रहा था, तब अमेरिका उसकी गतिविधियों पर नज़र रख रहा था।
भारत–रूस दोस्ती दशकों पुरानी है। नेहरू और ख्रुश्चेव के समय से शुरू हुई यह साझेदारी इंदिरा गांधी और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में और मजबूत हुई। आज भी प्रधानमंत्री मोदी रूस को “भारत का ध्रुवतारा” बताते हैं। लेकिन आज का दौर बहुत अलग है—यूक्रेन युद्ध ने पूरा समीकरण बदल दिया है। यूरोप रूस से दूर जा रहा है, NATO रूस पर लगातार दबाव बना रहा है, और इसी बीच जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन के राजदूतों ने भारत में आकर एक संयुक्त लेख लिखकर रूस की आलोचना की। यह साफ़ संकेत है कि पुतिन की भारत यात्रा वैश्विक राजनीति को भी बेचैन कर रही है।
ट्रम्प खुद रूस–भारत रिश्तों से असहज रहे हैं। उनके आरोपों ने भारत को कई बार मुश्किल में डाला—उन्होंने भारत पर यह तक कहा कि वह रूस का तेल खरीदकर यूक्रेन युद्ध को “फंड” कर रहा है। ट्रम्प की नीतियों के चलते भारत पर 50% तक के भारी शुल्क लग गए, जिससे निर्यात तेज़ी से गिरा। रुपये की गिरावट और वैश्विक बाज़ार की मंदी ने स्थिति को और खराब कर दिया। ऐसे समय में भारत को नए व्यापारिक बाज़ार चाहिए थे, और रूस तथा यूरेशियन इकनॉमिक यूनियन (EAEU) भारत के लिए प्राथमिक विकल्प बन गए।
पुतिन की इस यात्रा के दौरान भारत और रूस ने व्यापार और निवेश को 2030 तक 100 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा। दोनों देशों ने कई क्षेत्रों—ऊर्जा, उर्वरक, जहाज़ निर्माण, स्वास्थ्य, स्टील, बैंकिंग—में समझौते किए। सबसे अहम था कुदनकुलम में चार नए परमाणु संयंत्र बनाने का वादा। यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ऐतिहासिक कदम है, क्योंकि रूस दशकों से भारत का सबसे विश्वसनीय ऊर्जा सहयोगी रहा है। द्विपक्षीय व्यापार जो 2020 में सिर्फ 8 अरब डॉलर था, वह 2024–25 में बढ़कर लगभग 69 अरब डॉलर तक पहुँच गया।
रक्षा सहयोग भी मुख्य आधार बना हुआ है। हालांकि इस बार कोई बड़ा रक्षा सौदा नहीं हुआ—यह संकेत है कि भारत अमेरिका और रूस, दोनों से अपने रिश्ते बेहद संतुलित तरीके से चला रहा है। भारत न तो किसी एक पक्ष का झुकाव दिखाना चाहता है, न ही अपनी सैन्य निर्भरता को एक दिशा में सीमित करना चाहता है।
पुतिन ने प्रधानमंत्री मोदी से बातचीत के अलावा एक व्यापार मंच को संबोधित किया और रूस की सरकारी मीडिया चैनल RT के भारतीय संस्करण की शुरुआत की घोषणा भी की। ध्यान देने वाली बात यह है कि ट्रम्प आरटी चैनल के कट्टर आलोचक रहे हैं, और इसकी भारत में एंट्री कई सवाल खड़े करती है।
इस यात्रा के दौरान घरेलू राजनीति में भी हलचल हुई। विपक्ष के नेता राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे को राष्ट्रपति भवन के भोज में नहीं बुलाया गया। इसे लेकर राहुल गांधी ने आरोप लगाया कि सरकार परंपरा तोड़ रही है और विपक्ष को जानबूझकर दूर रखा जा रहा है। यह विवाद दिखाता है कि रूस यात्रा सिर्फ कूटनीति का मुद्दा नहीं रही, बल्कि भारतीय राजनीति में भी इसके अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पुतिन की यह यात्रा चर्चा का विषय है। 2020 के बाद यह उनकी पहली महत्वपूर्ण एशियाई यात्रा मानी जा रही है। इससे पहले वे केवल अलास्का में शांति वार्ता के लिए गए थे और फिर चीन में SCO बैठक में शामिल हुए। इसलिए दिल्ली की यह यात्रा बहुत प्रतीकात्मक मानी जा रही है—एक तरह से रूस दुनिया को संदेश दे रहा है कि वह अलग-थलग नहीं है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या यह यात्रा वास्तव में दुनिया में एक नए दौर की शुरुआत है? क्या अमेरिका, यूरोप, रूस और एशिया के बीच कोई नया संतुलन उभर रहा है? या फिर इससे तनाव और बढ़ेगा? अफ़ग़ानिस्तान, ईरान और यूक्रेन जैसे क्षेत्रों में हालात लगातार बदल रहे हैं। ट्रम्प की वापसी की संभावना और यूरोप की अस्थिर राजनीति इसे और जटिल बना रही है।
फिलहाल इतना साफ़ है कि भारत इस पूरी कूटनीति को बेहद संयम और सावधानी से चला रहा है। भारत न तो रूस से दूर जाना चाहता है और न अमेरिका को नाराज़ करना। यही संतुलन भारत की सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी चुनौती भी।




