अंतरराष्ट्रीय डेस्क 16 नवंबर 2025
अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प और ब्रिटिश सार्वजनिक प्रसारक बीबीसी के बीच चल रहा विवाद अब एक अंतरराष्ट्रीय टकराव का रूप ले चुका है। ट्रम्प ने आरोप लगाया है कि बीबीसी के प्रतिष्ठित कार्यक्रम Panorama ने उनके 6 जनवरी 2021 के भाषण की जालसाज़ी जैसी कट-छाँट (edited splicing) करके उन्हें दंगाइयों को उकसाने वाला दिखाया। इस कटे-फटे वीडियो में ट्रम्प के दो अलग-अलग वक्तव्यों को इस तरह जोड़कर दिखाया गया कि ऐसा लगे मानो उन्होंने सीधे तौर पर समर्थकों से कहा हो—“चलो कैपिटल की ओर” और “हम लड़ेंगे जैसे नर्क।” ट्रम्प का दावा है कि यह न केवल उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला है, बल्कि यह मीडिया द्वारा जनता को भ्रमित करने का खतरनाक उदाहरण भी है। इसी आधार पर उन्होंने घोषणा की है कि वे बीबीसी पर कम से कम 1 अरब डॉलर का मानहानि मुकदमा दायर करेंगे।
बीबीसी ने इस घटना के लिए औपचारिक रूप से क्षमा मांगी है। बीबीसी चेयरमैन समीर शाह ने व्हाइट हाउस को पत्र लिखकर कहा कि यह एडिट “अस्वीकार्य” था और चैनल इसकी जिम्मेदारी स्वीकार करता है। लेकिन बीबीसी ने स्पष्ट कर दिया कि वे ट्रम्प के मानहानि के दावे को कानूनी आधारहीन मानते हैं और किसी प्रकार का मुआवज़ा देने से इंकार करते हैं। इस विवाद के बढ़ने के बाद संस्था के भीतर भी उथल-पुथल छिड़ गई—डायरेक्टर-जनरल टिम डैवी और न्यूज़ प्रमुख डेबराह टर्नेस पर दबाव बढ़ा और बीबीसी की संपादकीय विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठने लगे। BBC ने आश्वासन दिया है कि भविष्य में किसी भी कार्यक्रम में ऐसा संपादन-दोष न हो इसके लिए वह आंतरिक ऑडिट चला रहा है।
ट्रम्प ने इस मामले को केवल व्यक्तिगत अपमान नहीं, बल्कि एक “सार्वजनिक कर्तव्य” बताते हुए कहा कि मीडिया को ऐसे “धोखाधड़ीपूर्ण संपादन” की अनुमति नहीं दी जा सकती। उनके अनुसार यह मामला सिर्फ मुआवज़े का नहीं बल्कि “झूठ फैलाने वाले मीडिया को जवाबदेह बनाने” का है। वहीं अमेरिकी और ब्रिटिश राजनीति में भी इस विवाद ने हलचल मचाई है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर से जब पूछा गया कि क्या वे ट्रम्प से मुकदमे की धमकी वापस लेने की अपील करेंगे, तो उन्होंने कहा कि बीबीसी स्वतंत्र संस्था है और जहाँ गलती है, उसे सुधारना ही होगा। इस बीच विशेषज्ञ बता रहे हैं कि फ्लोरिडा के मानहानि कानूनों के तहत ट्रम्प के लिए यह मुकदमा जीतना आसान नहीं होगा, क्योंकि पैनोरामा क्लिप अमेरिका में व्यापक रूप से प्रसारित नहीं हुई थी और कानूनी मानकों के अनुसार “जानबूझकर बदनाम करने” के सबूत पेश करना कठिन होगा।
इसके बावजूद, यह विवाद मीडिया-राजनीति के समीकरणों पर एक बड़ा सवाल खड़ा करता है—क्या सार्वजनिक प्रसारक भी राजनीतिक दबाव और संपादकीय गलतियों से सुरक्षित हैं? क्या किसी नेता की छवि एक वीडियो एडिट से इतनी आसानी से प्रभावित हो सकती है? और क्या विशाल मीडिया संस्थाएँ अपनी गलतियों के लिए पर्याप्त पारदर्शिता और जवाबदेही दिखाती हैं? ट्रम्प-बीबीसी विवाद की गूँज सिर्फ अदालतों तक नहीं जाएगी, बल्कि यह भविष्य में मीडिया नैतिकता, राजनीतिक संचार और अंतरराष्ट्रीय संबंधों — तीनों पर असर छोड़ सकती है।




