नई दिल्ली, 24 अक्टूबर 2025
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस वक्त एक नया और चिंताजनक संकेत साफ़-साफ़ दिखाई दे रहा है — आदेश वॉशिंगटन से आता है और उसका पालन नई दिल्ली में होता है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रूस पर दबाव बढ़ाने की खुली चेतावनी के कुछ ही दिनों के भीतर, भारत की नीति में यह बदलाव स्पष्ट हो गया है। इसका ताज़ा और सबसे ठोस प्रमाण भारत की सबसे बड़ी निजी तेल कंपनी, रिलायंस इंडस्ट्रीज़ लिमिटेड (RIL) के बयान से आया है, जिसने आधिकारिक रूप से कहा है कि वह रूसी तेल आयात को “रीकैलिब्रेट” कर रही है — यानी कम कर रही है — ताकि वह “भारत सरकार के नए दिशा-निर्देशों के अनुरूप रह सके।” यह कॉर्पोरेट घोषणा सीधे तौर पर यह दर्शाती है कि जो संकेत शीर्ष स्तर पर मिले, वही लाइन अब कॉर्पोरेट नीति तक चल रही है।
रिलायंस, जो रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदकर मुनाफा कमा रही थी, उसका यह कदम उस समय आया जब ट्रंप ने अपनी रैलियों में कहा कि “जो देश रूस से डील करेगा, वह हमारे साथ नहीं रहेगा।” यह तीव्र नीतिगत बदलाव इस बात का प्रमाण है कि नरेंद्र मोदी की सरकार अमेरिकी प्रभाव के आगे झुकने को तैयार है।
विश्लेषक रिलायंस के इस “रीकैलिब्रेशन” को केवल कॉर्पोरेट नीति का मामला नहीं मान रहे हैं, बल्कि इसे “सॉफ्ट सरेन्डर” और अमेरिका को खुश करने की स्पष्ट नीति के रूप में देख रहे हैं। यह कदम न केवल भारत की ऊर्जा स्वतंत्रता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी स्थापित करता है कि एक ऐसा प्रधानमंत्री जो कभी “विश्वगुरु भारत” का दावा करता था और जिसने कहा था कि “भारत किसी के दबाव में नहीं झुकेगा,” आज हर अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने मौन और विनम्र दिखाई दे रहा है।
भारत के हितों की रक्षा करने के बजाय अब लक्ष्य वॉशिंगटन को नाराज़ न करना लगता है। रिलायंस का यह कदम एक व्यापक संदेश देता है कि भारत की आर्थिक और ऊर्जा नीति अब ‘स्वदेशी हित’ से ज़्यादा ‘विदेशी इशारों’ पर आधारित होती जा रही है, जिससे देश की “आत्मनिर्भर भारत” की संकल्पना पर ही सीधा सवाल उठ खड़ा होता है।
यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र के लिए एक खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है: क्या भारत अब अपनी ऊर्जा नीति भी ट्रंप के ट्वीट्स से तय करेगा? एक सच्चा नेता वह होता है जो अपने देश के हित में दुनिया से टकरा जाए, न कि वह जो विदेशी दबाव में अपनी नीति “रीकैलिब्रेट” कर दे। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि विदेशी दबाव में भारत ने अपनी रणनीतिक स्वायत्तता को कमजोर किया है, और एक बार फिर झुक गया है।




