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ट्रेन लेट, सड़क जाम और अब इंडिगो संकट—क्या भारत में आम नागरिक के समय की कोई कीमत नहीं?

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आलोक कुमार । नई दिल्ली 8 दिसंबर 2025

देश में समय की कीमत लगातार गिरती दिख रही है। पिछले कुछ वर्षों से रेल की देरी, हाईवे पर घंटों लंबा जाम और अब इंडिगो एयरलाइन का गहराता संकट एक साथ मिलकर यह कठोर सच्चाई सामने ला रहे हैं कि भारत में आम नागरिक के समय को कितनी आसानी से अनदेखा कर दिया जाता है। चाहे वह छात्र हो, नौकरीपेशा मध्यमवर्ग, व्यापारिक यात्रा पर निकला कारोबारी या फिर किसी आपात स्थिति से जूझ रहा परिवार—हर कोई इस अव्यवस्था के बोझ को रोजाना ढो रहा है। सवाल उठता है कि क्या हमारे समय की कोई कीमत है? क्या सरकारों और सिस्टम में बैठे लोग इस लगातार फैलते अव्यवस्थित यात्रातंत्र की गंभीरता को समझना चाहते हैं?

देश में रेलवे देरी किसी नई समस्या का नाम नहीं, लेकिन इन वर्षों में यह एक “सामान्य” स्थिति बन चुकी है। कभी कोहरे का बहाना, कभी ट्रैफिक ब्लॉक, कभी मेंटेनेंस और कभी अचानक तकनीकी खराबी—रेलवे अपने डिफेंस तैयार रखता है, लेकिन उसके कारण समय पर स्टेशन पहुंचने वाली लाखों यात्रियों की ज़िंदगी अस्त-व्यस्त होती रहती है। ऑफिस के लिए देर, किसी परीक्षा का छूट जाना, परिवार से मिलने की योजना का बिगड़ जाना—इन सबके पीछे कोई जवाबदेही दिखाई नहीं देती। भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े नेटवर्कों में शामिल है, लेकिन इसके यात्रियों का समय अब भी सिस्टम की तरजीह में नीचे ही फैला रहता है।

इधर सड़कों पर हालत और खराब हो चुकी है। देश के कई महानगर जाम के स्थायी अड्डे बन गए हैं। दिल्ली, बेंगलुरु, मुंबई, पुणे जैसे शहरों में सड़क पर उतरते ही लगता है कि यातायात किसी अदृश्य दलदल में फंसा हुआ है। लोग 5 किलोमीटर की दूरी तय करने में 45 मिनट खर्च कर रहे हैं। सरकारी योजनाएं, स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट, फ्लाईओवर और एक्सप्रेसवे की घोषणाएं होती रहती हैं, लेकिन आम आदमी का समय हर दिन इस अराजकता में घुलता जा रहा है। सड़क पर रुका हर वाहन न सिर्फ ईंधन जला रहा है, बल्कि उस व्यक्ति की उत्पादकता, ऊर्जा और मानसिक शांति को भी खत्म कर रहा है। यह स्थिति कोई दुर्घटना नहीं, बल्कि अव्यवस्थित शहरी नियोजन की देन है।

और अब इंडिगो एयरलाइन का संकट इस त्रासदी का सबसे नया चेहरा बनकर सामने आया है। पिछले दिनों से 250 से अधिक उड़ानें रद्द या बुरी तरह विलंबित हुईं। हजारों यात्रियों को घंटों हवाईअड्डों पर फंसे रहना पड़ा। कोई विदेश की कनेक्टिंग फ्लाइट खो बैठा, किसी का मेडिकल अपॉइंटमेंट छूट गया, तो कोई महत्वपूर्ण इंटरव्यू तक नहीं पहुंच पाया। यात्रियों ने साफ कहा कि उन्हें समय पर न तो सही जानकारी मिली, न सहायता। एयरलाइन की ओर से देरी की वजहें सामने आईं—मौसम, ऑपरेशनल चुनौतियां, पायलट विवाद, स्टाफ शॉर्टेज—लेकिन यात्रियों की परेशानी का मूल्यांकन कहीं गायब दिखा। विडंबना यह है कि देश की सबसे बड़ी एयरलाइन होने के बावजूद इंडिगो का संचालन हाल के दिनों में अफरा-तफरी का पर्याय बन गया है। सवाल उठ रहा है कि एविएशन रेगुलेटर DGCA की निगरानी आखिर कहां है? क्या इतनी भारी संख्या में उड़ानों की रद्दीकरण पर कोई सख्त कार्रवाई होगी?

भारत में समय को लेकर अव्यवस्था का यह त्रिकोण—रेलवे की देरी, सड़क जाम और एयरलाइंस का ढहता अनुशासन—एक बड़े संक्रमण की कहानी कह रहा है। दुनिया के विकसित देशों में समय को आर्थिक संसाधन माना जाता है, लेकिन भारत में यह नियम उल्टा चलता दिखता है। यहां समय की कोई कीमत नहीं—न प्रशासन के लिए, न सेवा प्रदाताओं के लिए, और न उन सिस्टम के लिए जो इन व्यवस्थाओं को संभालते हैं। नतीजा यह है कि एक आम भारतीय अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा “इंतजार” करने में बिताने को मजबूर है—कभी ट्रेन का इंतजार, कभी ट्रैफिक से निकलने का इंतजार, कभी उड़ान के टेकऑफ का इंतजार।

भारत एक उभरती वैश्विक शक्ति होने की आकांक्षा रखता है, और इसके लिए जरूरी है कि समय को संसाधन की तरह महत्व दिया जाए। जब तक रेलवे, सड़क परिवहन और एविएशन तीनों क्षेत्रों में कठोर जवाबदेही, आधुनिक प्रबंधन, पारदर्शिता और यात्रियों के समय के प्रति सम्मान नहीं दिखाया जाएगा, तब तक यह देश अपनी क्षमता से बहुत पीछे भटकता रहेगा।

एक सवाल हर भारतीय के मन में बार-बार उठ रहा है—क्या हमारे समय की कोई कीमत नहीं? और जब तक इसका जवाब मजबूत और प्रभावी नीतियों के रूप में नहीं मिलेगा, तब तक स्थितियां बदलने वाली नहीं।

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