एबीसी डेस्क 16 दिसंबर 2025
देश की राजधानी दिल्ली समेत उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा इन दिनों गंभीर वायु प्रदूषण की चपेट में है। सड़कों पर सांस लेना मुश्किल होता जा रहा है, अस्पतालों में दमा और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों के मरीज बढ़ रहे हैं और आम आदमी रोज़मर्रा की जिंदगी में पाबंदियों के बोझ तले दबता दिख रहा है। इसी बीच एक ओर दिल्ली सरकार बिना वैध PUC के वाहनों को ईंधन न देने जैसे सख्त फरमान जारी कर रही है, तो दूसरी ओर भारत में वायु प्रदूषण से निपटने के नाम पर विश्व बैंक ने 600 मिलियन डॉलर (करीब 5,000 करोड़ रुपये) से अधिक की राशि मंजूर की है। सवाल यह है कि क्या इससे ज़मीन पर हालात बदलेंगे या फिर जनता के हिस्से में सिर्फ नियम और रोक-टोक ही आएगी।
मंजूर की गई यह राशि मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और हरियाणा में स्वच्छ हवा से जुड़ी परियोजनाओं पर खर्च की जानी है। दावा किया जा रहा है कि इन योजनाओं से करीब 27 करोड़ लोगों को बेहतर हवा का लाभ मिलेगा और प्रदूषण से जुड़ी स्वास्थ्य समस्याओं के साथ-साथ आर्थिक नुकसान को भी कम किया जा सकेगा। सरकार और एजेंसियां इसे उत्तर भारत के लिए एक बड़ा कदम बता रही हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि जिन शहरों और कस्बों में हवा सबसे ज़्यादा जहरीली है, वहां आम लोग आज भी तत्काल राहत से कोसों दूर हैं।
योजनाओं के मुताबिक, उत्तर प्रदेश में इस फंड का इस्तेमाल परिवहन, खेती और उद्योग से होने वाले उत्सर्जन को कम करने पर किया जाएगा। इसमें इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा, स्वच्छ रसोई ईंधन का विस्तार और छोटे कारोबारियों व किसानों को पर्यावरण के अनुकूल तकनीक अपनाने में सहायता शामिल है। वहीं हरियाणा में हवा की निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने, प्रदूषण मापने वाले नेटवर्क के विस्तार और इलेक्ट्रिक सार्वजनिक परिवहन को आगे बढ़ाने की योजना है। दोनों राज्यों की ये पहलें इंडो-गंगा के मैदानी इलाकों में प्रदूषण घटाने और हरित रोजगार पैदा करने के बड़े लक्ष्य से जोड़ी जा रही हैं।
लेकिन सवाल जस का तस है—जब अरबों रुपये की अंतरराष्ट्रीय मदद और बड़ी-बड़ी योजनाएं मौजूद हैं, तो हर सर्दी में उत्तर भारत की हवा क्यों दमघोंटू बन जाती है? दिल्ली में कभी ऑड-ईवन, कभी GRAP, कभी स्कूलों की बंदी और अब बिना PUC के ईंधन पर रोक—इन फैसलों का सीधा असर आम आदमी पर पड़ता है। लोगों का कहना है कि प्रदूषण की कीमत हर बार वही क्यों चुकाए, जबकि उद्योग, बड़े निर्माण कार्य और सरकारी स्तर की जवाबदेही पर बात कम होती है।
आलोचकों का मानना है कि AQI के नाम पर तात्कालिक सख्ती दिखाना आसान है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए जिस ईमानदार क्रियान्वयन, पारदर्शिता और दीर्घकालिक नीति की जरूरत है, वह अक्सर नज़र नहीं आती। विश्व बैंक की मंजूर राशि भी तभी असर दिखा पाएगी, जब योजनाएं कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरें और आम लोगों को वास्तविक राहत मिले।
फिलहाल हालात यही संकेत देते हैं कि एक तरफ जनता पर नियमों की मार, दूसरी तरफ स्वच्छ हवा के बड़े-बड़े वादे। साफ हवा कब हकीकत बनेगी, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन आज की सच्चाई यही है—बड़े AQI के नाम पर सांस भी शर्तों के साथ।




