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दुनिया में अनाज भरपूर, कीमतें नीचे, भारत के सामने सवाल: क्या किसान सुरक्षित हैं?

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शिवाजी सरकार, अर्थशास्त्री | नई दिल्ली 2 जनवरी 2026

2026 में खाद्य स्थिति: ऊपर से सब ठीक दिखता है

साल 2026 में भारत और दुनिया की खाद्य स्थिति देखने में काफ़ी बेहतर लगती है। देश के गोदाम अनाज से भरे हैं, सब्ज़ियों के दाम पहले के मुकाबले कम हो रहे हैं, चीनी जरूरत से ज़्यादा है और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भी खाने-पीने की चीज़ों के दाम ठंडे पड़े हैं। यह सब उस समय हो रहा है, जब यूक्रेन और पश्चिम एशिया में युद्ध चल रहे हैं और मौसम का मिज़ाज भी लगातार बिगड़ रहा है। संयुक्त राष्ट्र की संस्था FAO और विश्व बैंक—दोनों बता रहे हैं कि महामारी और युद्ध के दौर में जो महंगाई चरम पर थी, वह अब धीरे-धीरे नीचे आ रही है। आम आदमी के लिए यह राहत की खबर है।

राहत का दूसरा चेहरा: किसान की चिंता

लेकिन यही राहत किसानों के लिए परेशानी बनती जा रही है। जब खाने की चीज़ों के दाम गिरते हैं, तो उपभोक्ता खुश होता है, मगर किसान की आमदनी कम होने लगती है। भारत में खेती का बड़ा हिस्सा किसान खुद अपने पैसे से करता है। सरकार केवल कुछ फसलों में MSP और खरीद का सहारा देती है। ऐसे में जब बाज़ार में दाम नीचे जाते हैं, तो नुकसान सीधे किसान को झेलना पड़ता है। यह अजीब विरोधाभास है—जो चीज़ शहर के लोगों को सुकून देती है, वही गाँव के किसान पर बोझ बन जाती है।

कीमतें क्यों गिर रही हैं? असली वजहें

दुनिया के कई बड़े देशों—जैसे अमेरिका, रूस, ब्राज़ील और कनाडा—में इस बार गेहूं, मक्का और चावल की रिकॉर्ड पैदावार हुई है। युद्ध के बावजूद ब्लैक सी से अनाज का निर्यात जारी रहा। तेल, गैस और उर्वरकों के दाम कुछ हद तक नीचे आए। ट्रांसपोर्ट का खर्च भी घटा। साथ ही चीनी और डेयरी उत्पादों में मांग कम और उत्पादन ज़्यादा हो गया। इन सब कारणों से अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में खाने की चीज़ें सस्ती हो गईं।

FAO और विश्व बैंक यह भी कहते हैं कि दुनिया के औसत आंकड़े पूरी सच्चाई नहीं बताते। कई गरीब और विकासशील देशों में आज भी लोग महंगाई और भूख से जूझ रहे हैं। मतलब साफ है—दुनिया में दाम गिरने से हर जगह हालात अपने-आप ठीक नहीं हो जाते।

भारतीय किसान पर सीधा असर

भारत के करीब 86 प्रतिशत किसान छोटे और सीमांत हैं। उनके पास न ज़्यादा ज़मीन है, न ज़्यादा बचत। जब वैश्विक कीमतें गिरती हैं, तो भारतीय कृषि उत्पादों का निर्यात कमजोर पड़ जाता है। चीनी, चावल और दूध पैदा करने वाले किसानों को नुकसान होता है। कई बार उन्हें अपनी फसल लागत से भी कम दाम पर बेचनी पड़ती है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि खेती की लागत कम नहीं होती। खाद, बीज, डीज़ल, बिजली—इन सबके दाम वहीं रहते हैं। यानी किसान की आमदनी घटती है, लेकिन खर्च जस का तस बना रहता है। ऊपर से मौसम पर निर्भरता, मिट्टी की खराब हालत और कटाई के बाद भंडारण की कमी नुकसान को और बढ़ा देती है।

बाज़ार की मजबूरी और बिचौलियों की भूमिका

कई किसानों के पास गोदाम या कोल्ड स्टोरेज नहीं होते। इसलिए उन्हें फसल कटते ही बेचनी पड़ती है, जब दाम सबसे कम होते हैं। इस बीच बिचौलिये ज़्यादा मुनाफ़ा कमा लेते हैं और किसान को उपभोक्ता के दिए गए हर रुपये में से बहुत छोटा हिस्सा मिलता है। किसान अपने ही बाज़ार में मजबूर बन जाता है।

फिर भी हालात पूरी तरह बिगड़े नहीं हैं

इसके बावजूद भारत की स्थिति पूरी तरह चिंताजनक नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह सरकारी नीतियाँ हैं। गेहूं और चावल जैसी मुख्य फसलों पर MSP और सरकारी खरीद किसानों को कुछ सुरक्षा देती है। भारतीय खाद्य निगम बड़ी मात्रा में अनाज खरीदकर किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाज़ार के उतार-चढ़ाव से बचाता है।

भारत का बड़ा घरेलू बाज़ार भी मदद करता है। देश के भीतर खपत ज़्यादा होने से पूरी पैदावार बाहर के बाज़ार पर निर्भर नहीं रहती। जब दाम बहुत बढ़ते हैं, तो सरकार निर्यात पर रोक या टैक्स लगाती है। जब दाम बहुत गिरते हैं, तो खरीद और भंडारण के ज़रिये राहत देने की कोशिश होती है।

रिकॉर्ड उत्पादन: ताकत भी, चुनौती भी

भारत में खाद्यान्न उत्पादन लगातार बढ़ रहा है। 2025–26 में 362 मिलियन टन से ज़्यादा उत्पादन का लक्ष्य है। यह खाद्य सुरक्षा के लिए अच्छी खबर है, लेकिन इतनी ज़्यादा पैदावार को संभालना भी बड़ी चुनौती है। अगर सही भंडारण और बाज़ार नहीं मिला, तो यही सरप्लस किसानों के लिए संकट बन सकता है।

FPO: उम्मीद की किरण, लेकिन अधूरी

किसान उत्पादक संगठन यानी FPO किसानों को जोड़कर उनकी ताकत बढ़ाने का जरिया हैं। इससे किसान मिलकर सौदा कर सकते हैं, सीधे बाज़ार तक पहुँच सकते हैं और लागत घटा सकते हैं। जिन किसानों ने FPO से जुड़ाव किया है, उनकी आमदनी अपेक्षाकृत बेहतर हुई है।

लेकिन कई FPO को पैसे, अच्छे प्रबंधन और लंबे समय तक सरकारी सहयोग की कमी है। तीन साल की मदद कई बार पर्याप्त नहीं होती। FPO को मज़बूत बनाने के लिए उन्हें पेशेवर तरीके से चलाना ज़रूरी है।

इन्फ्रास्ट्रक्चर: चुपचाप बड़ा काम

जहाँ उम्मीद दिखाई देती है, वह है कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर। सरकार के कृषि इंफ्रास्ट्रक्चर फंड के तहत गोदाम, कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और लॉजिस्टिक्स पर हज़ारों करोड़ रुपये खर्च हो रहे हैं। इससे किसान अपनी फसल को कुछ समय तक रोक सकते हैं, सही समय पर बेच सकते हैं और नुकसान कम कर सकते हैं।

ये योजनाएँ तुरंत दाम नहीं बढ़ातीं, लेकिन किसान को मजबूरी में सस्ता बेचने से बचाती हैं। लंबे समय में यही चीज़ खेती को स्थिर बनाती है।

आगे का रास्ता: संतुलन ही समाधान

खाने की चीज़ों के दाम गिरना अपने आप में बुरा नहीं है। यह बेहतर उत्पादन और व्यवस्था का संकेत भी हो सकता है। लेकिन अगर इस गिरावट में किसान की आमदनी का ख्याल न रखा जाए, तो संकट गहरा सकता है।

भारत के लिए असली चुनौती यही है कि अनाज की भरमार किसानों के लिए सज़ा न बने। उपभोक्ता को राहत मिले, लेकिन किसान को नुकसान न हो। MSP, भंडारण, प्रोसेसिंग, मज़बूत FPO और संतुलित बाज़ार—इन सबके ज़रिये ही यह मुमकिन है।

अगर यह संतुलन बना रहा, तो यह दौर एक संभालने योग्य चरण साबित होगा। अगर नहीं, तो यही प्रचुरता खेती के लिए बड़ी परेशानी बन सकती है।

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