सुप्रीम कोर्ट में उमर खालिद, शरजील इमाम, गुलफिशा फातिमा और अन्य की ज़मानत याचिकाओं पर जो कुछ हुआ, उसने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या हमारे देश का न्यायिक और प्रशासनिक तंत्र अब अपनी संवेदनशीलता खो चुका है? लोकतंत्र का असली चेहरा तब दिखाई देता है जब एक नागरिक को बिना दोष सिद्ध हुए सालों तक जेल में रखा जाता है, और सिस्टम उसे अपनी लापरवाही के बोझ तले कुचल देता है। अदालतें, पुलिस और अभियोजन पक्ष — तीनों मिलकर एक ऐसा ‘जाल’ बनाते हैं, जिसमें फँस जाने के बाद निर्दोष व्यक्ति के लिए निकलना लगभग असंभव हो जाता है।
वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल साहब ने सुप्रीम कोर्ट में कुछ ऐसे आंकड़े रखे, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शर्म की बात हैं। उन्होंने बताया कि उमर खालिद के मामले में अब तक 55 सुनवाई की तारीख़ों पर जज छुट्टी पर थे, 26 बार कोर्ट में समय नहीं था, और 59 बार सरकारी वकील यानी स्पेशल पब्लिक प्रॉसीक्यूटर ही अनुपस्थित थे। इसका मतलब यह हुआ कि 140 से ज़्यादा सुनवाई सिर्फ़ सिस्टम की सुस्ती और गैर-जिम्मेदारी में बर्बाद हुईं, और आज भी पुलिस यही कहती है कि “आरोपी ट्रायल से बच रहे हैं।” यह वक्त है जब हमें खुद से पूछना होगा कि क्या न्यायपालिका और पुलिस अब जवाबदेही से ऊपर हैं?
सवाल यह भी है कि क्या न्याय का चेहरा अब पहचान देखकर बदल जाता है? 751 FIRs में उमर खालिद का नाम सिर्फ़ एक में है, और उस एक केस में भी ट्रायल शुरू नहीं हुआ, फिर भी वो 5 साल से जेल में हैं। क्या यह न्याय है? क्या यही है “मदर ऑफ डेमोक्रेसी” का दावा करने वाला भारत, जहाँ एक नागरिक को उसकी विचारधारा और नाम के आधार पर सज़ा दी जाती है? जब नाम ‘उमर’ या ‘शरजील’ होता है, तो जांच, ट्रायल और न्याय – सब धीमी गति से चलने लगते हैं। यही वह अदृश्य जाल है जो धीरे-धीरे अपने ही नागरिकों को फँसाता है।
हमारे सिस्टम की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि वह इंसाफ़ देने से पहले ही किसी को अपराधी मान लेता है। पुलिस चार्जशीट दाख़िल कर देती है, मीडिया पहले ही फैसला सुना देती है, और अदालतें उस माहौल से खुद को अलग नहीं रख पातीं। एक आम आदमी के पास पैसे नहीं, ताकत नहीं, मीडिया तक पहुंच नहीं — और फिर यह “सिस्टम” उसे अपने मकड़जाल में फँसा लेता है। सालों की जेल, टूटे परिवार, बर्बाद करियर, और फिर अगर कभी जमानत मिल भी जाए, तो वह राहत नहीं, बल्कि “विलंबित न्याय” की कीमत होती है।
अब इस केस की अगली सुनवाई 3 नवंबर को है। देखा जाएगा कि इस बार अदालत ‘वीकेंड मोड’ से बाहर आती है या नहीं। मगर असली सवाल यह नहीं है कि उमर खालिद को ज़मानत मिलेगी या नहीं — असली सवाल यह है कि क्या भारत का लोकतंत्र इतना ठंडा हो गया है कि अब उसे अपने ही नागरिकों की पुकार सुनाई नहीं देती? क्या अदालतें भी अब उन्हीं ताक़तों के आगे झुक रही हैं जो “न्याय” को “विचारधारा” से तौलती हैं?
एक लोकतंत्र तब मज़बूत होता है जब वह अपनी आलोचना को सहने की क्षमता रखता है, अपने असहमत नागरिकों को दुश्मन नहीं समझता। लेकिन अगर अदालतों में तारीख़ें ही न्याय की जगह लेने लगें, तो यह संकेत है कि हमारा सिस्टम अब लोगों की सेवा नहीं, बल्कि उनकी “सज़ा” बन गया है। यह जाल हमें पहचानना होगा, तोड़ना होगा — वरना अगला नाम किसी और का होगा, पर कहानी वही रहेगी।




